*भारतीय! अभिवादन सर्वश्रेष्ठ है*।

         सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा वर्षा


       भारत अभिवादन परंपरा हमारे भारतीय आचार -व्यवहार का एक प्रमुख अंग रहीहै। विशेष कर अपने श्रेष्ठ जनों का अभिवादन करना तो हमारी संस्कृति के प्राण है। हमारे यहां के अवतरित तक अपने से वृद्ध व गुरुजनों का नियमित अभिवादन करते दिखाई देते थे। 

गोस्वामी तुलसीदास जी वर्णन करते हैं-

*प्रातकाल उठी कै रघुनाथा।*

*मात-पिता गुरु नावहीं माथा।।*

स्वयं श्रीराम प्राप्त काल उठकर अपने माता-पिता व गुरुजनों के सामने शीश नवाते थे।

उल्लेखनीय बात यह है , हमारे यहां की अभिवादन शैली बड़ी ही अपूर्व और विलक्षण रही है। हम अपने हम उम्र या समान जनों को दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम करते हैं। साथी 'नमस्ते' 'नमस्कार' करते हैं। अपने से श्रेष्ठ या वृद्धजनों के हम चरण में झुक कर अपना मस्तक (माथा) स्पर्श करते हैं। यह है भारतीय प्रणाम की परिभाषा! भारतीय अभिवादन में छिछलापन नहीं है। भारी गरिमा है। इसमें गहन अर्थ और मर्म भी छिपा है। श्रीमद् भागवत (4/3/22) मैं भगवान शंकर मां सती को समझते हैं-

*प्रत्युद्गमप्रश्रयणाभिवादनं विधीयते साधु मिथ: समुध्यमे ।*

*प्रज्ञै: परस्मै पुरूषाय चेतसा गुहाशयायैव न देहमानिने।।*

है समुध्यमे सती ! सज्जन लोग परस्पर अभिवादन करते हैं, तो एक दूसरे की देख प्रणाम नहीं करते। वे दैहिक अभियान को तुष्ट करने के लिए भी यह क्रिया नहीं करते। वे तो सबके अंतःकरण में अंतर्यामी रूप से स्थित परम पुरुष वासुदेव को ही प्रणाम करते हैं। 

कहने का आशय है कि हमारी संस्कृति कि यह मान्यता है, आप जब श्रेष्ठ जनो, संत -समाज, देवगणो, आचार्यगणो या माता-पिता आदि, किसी को भी प्रणाम करते हैं, तो यह अर्पित नमस्कार देवों के देव केशव को इस प्रकार जाता है, जैसे आकाश से गिरा हुआ जल संहिताओं से होता हुआ सीधे सागर में समता है। इसलिए संसार के सभी मानव, महापुरुषों से उच्च -नीच का भेद भाव ना करें। अतः उन्हें समर्पित भावनाएं अथवा सामंजनक तरंगे परम चेतना या ईश्वर को संचारित होती है। 

ॐ श्री आशुतोषाय नमः 

श्री सियाबिहारी जी ✍️

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