सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा वर्षा
संत कबीर दास जी बताते हैं कि हमारे अंतर्गत में शून्य महाल(तृतीय नेत्र) है, जहां अनंत ब्रह्म का अलौकिक प्रकाश दिखता है- *शून्य महल में दियना बारिले।'*
इसके ऊपर पर्दा ढका हुआ है। जब वह आवरण उठता है, तब अनंत सत्ता (ईश्वर) का प्रकाश रूप में दर्शन होता है,*'घुंघट के पट खोल रे तोहे पिया मिलेंगे।'* प्रकाश ही नहीं, आज्ञा चक्र ही वह स्थल है, जहां प्रकाश का दर्शन (*बिन सूरज उजियारा*), नाम का सुमिरन (*बिन सुर शब्द उजारा),* अनहद नाद का श्रवण (*सुन महल में नौबत बाजे)* और अमृत का आस्वादन *(बिन जल बूंद परत जहा भारी, नहि मीठा नहीं खारा*) अर्थात 4 स्वरूपो में ब्रह्म का साक्षात्कार होता है। अंततः इसी शुन्य महल में ध्यान का अभ्यास करने से आपका ईश्वर से पूर्णतशया मिलन भी हो जाता है।
कबीर जी के वाणी का सार यह है कि उसे शुन्यतत्व का दर्शन शुन्य महल अर्थात आज्ञा चक्र में किया जा सकता है। इस शुन्यत्व के भीतर ही अनंत ब्रह्म के उक्त स्वरूपों का अनुभव कर पाना भी शत- प्रतिशत संभव है।
ॐ श्री आशुतोषाय नमः
श्री सियाबिहारी जी ✍️
