*कर्मों की सार्थकता तभी है, जब वह प्रभु को समर्पित कर दिए जाएं।*
श्री आर सी सिंह जी रिटायर्ड एयरफोर्स ऑफिसरकर्मों की सार्थकता तभी है, जब वह प्रभु को समर्पित कर दिए जाएं। मुण्डकोपनिषद में कहा गया है कि प्रभु न तो इन आँखों के द्वारा देखा जा सकता है और न ही अन्य इन्द्रियों के द्वारा प्रभु की प्राप्ति हो सकती है। तपस्या एवं कर्मों के द्वारा भी प्रभु की प्राप्ति नहीं हो सकती। जब ज्ञान की कृपा होती है, अन्तर्दृष्टि खुलती है, तभी मनुष्य अपने अन्तर में निष्कलं ब्रह्म का ध्यान करते हुए प्रभु का दर्शन करता है। जब भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दर्शन दिए तो कहते हैं - हे अर्जुन, तुमने अभी जिस स्वरूप को देखा है उस रूप में मुझको न तो वेदों के अध्ययन के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है, न तपस्या के द्वारा, न दानादि के द्वारा और न ही यज्ञ के द्वारा देखा जा सकता है।
तो हम किस प्रकार इन बाहरी कर्मों के द्वारा प्रभु प्राप्ति के बारे में कह सकते हैं। आश्चर्य है कि आज बड़े बड़े आचार्य, पाठी, पुरोहित मनुष्यों को सांसारिक कर्म काण्डों में ही उलझाए रखा है।
*ओम् श्री आशुतोषाय नम*
RC Singh.7897659218.

बहुत सुंदर प्रस्तुति।
ReplyDeleteजय महाराज जी की।