*आत्मज्ञान एक ऐसा आध्यात्मिक विज्ञान है जिससे अपने अंदर सोई चेतना को जगाया जा सकता है।*

 सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

                              श्री आर सी सिंह जी 

भौतिक प्रकृति के पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश 5 स्थूल पदार्थ हैं। इन्ही के सूक्ष्म तत्व गन्ध, रस, रूप, स्पर्श, शब्द हैं, जो हमारे विषय-भोग कहलाते हैं। फिर भी इन विषय रूपी भोगों में रस/सुख अस्थायी है। दूसरी ओर भोगों को भोगने में हमारी सभी इंद्रियां उम्र बढ़ने के साथ-साथ कमजोर भी होती जाती हैं। ऐसा ज्ञान मन में स्थिर होने पर ही इन विषयों के प्रति अरुचि पैदा होती है और स्थायी सुख/आनंद की तलाश शुरू होती है, उससे पूर्व नहीं....

     भौतिक प्रकृति परमात्मा द्वारा संचालित एक अदालत है। प्रकृति की 84 लाख योनियों में असंख्य जीवों को मनुष्य योनि में ही किए गए पाप पुण्य कर्मों का फल दिया जाता है। इस अदालत में एक न्याय व्यवस्था है जहाँ देर भी नहीं है और अंधेर भी नहीं है। इसलिए कभी भी पाप मत करें। हालांकि किसी भी जीव को सहनशक्ति से अधिक दण्ड कभी नहीं दिया जाता.... 

      आत्मज्ञान यानि ब्रह्मज्ञान एक ऐसा आध्यात्मिक विज्ञान है, जिससे अपने अंदर सोई चेतना को जगाया जा सकता है। जब आंतरिक चेतना जागती है, तो मन की सोच अपने आप बदलती है। सोच बदलती है तो व्यवहार और योग्यता भी तेजस्वी हो जाती है। 

     भगवान श्री कृष्ण जब अर्जुन को आत्मज्ञान देते हैं, तो अर्जुन उद्घोष करते हैं- "नष्टो मोह: स्मृतिर्लब्धा"- मेरा मोह नष्ट हुआ और मैं सुमति के साथ युद्ध करने के लिए तैयार हूँ। इस तरह द्वापर का योद्धा कर्मवीर बन जाता है। 

*ओम् श्री आशुतोषाय नम:*

'श्री रमेश जी'

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