*निष्काम कर्म आध्यात्मिक फल देते हैं।*

 सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

                              श्री आर सी सिंह जी 

84 लाख योनियों में केवल मनुष्य योनि में ही किए गए सभी सकाम भाव से कर्म - विकर्म लिखे जाते हैं। सकाम कर्म केवल पदार्थ रूपी फल देकर नष्ट हो जाते हैं, जबकि निष्काम कर्म आध्यात्मिक ज्ञान रूपी फल देते हैं। फिर आध्यात्मिक ज्ञान होने से ही संसार से वैराग्य और परमात्मा से प्रीति का बीज अंकुरित होता है, जो एक दिन वृक्ष का रूप धारण कर मनुष्य को आनंद रूपी फल देता है....

     सभी मनुष्यों के तन की आवश्यकताएं सदा ही सीमित होती है। जबकि मन में भोगों की इच्छाएं असीमित होती है, जिनकी पूर्ति के लिए ही मनुष्य कर्म ही नहीं, बल्कि विकर्म भी कर जाता है। जिसके कारण भविष्य में मनुष्य को दुखों की प्राप्ति होती है। 

     मनुष्य एक सामाजिक जीव है। उसको अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अन्य मनुष्यों का सहयोग लेना ही होता है। फिर भी हम सभी मनुष्य आपस में जब जब प्रभु की चर्चा करते हैं, बस वही समय स्वर्ग है। और जब जब हम विषय भोगों की चर्चा करते हैं, बस उसे ही नरक मानिये। हम सभी मनुष्यों को अपना अपना आकलन स्वयं ही करना चाहिए कि हमारी दिनचर्या कैसी रहती है?

*ओम् श्री आशुतोषाय नम:*

'श्री रमेश जी'

Post a Comment

Previous Post Next Post