सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
श्री रमेश चंद सिंह जी
जब-जब अधर्म का अंधकार गहन से गहनतम हुआ है, तब-तब धर्म रूपी सूर्य ने उसका छेदन किया है! जब-जब विचारों में विकारों की दुर्गंध फैली है, तब-तब भक्ति की लहर ने उसे सुगंधित किया है! ऐसी ही श्रद्धा और भक्ति की सुगंध नगर में चारों ओर फैली हुई थी। क्यों कि तथागत रूपी सूर्य अपने अनेक भिक्षुओं के साथ नगर को प्रकाशित कर रहे थे! पर यह क्या? आज नगरवासी महात्मा बुद्ध के दर्शन के लिए नही आए, और जो आये भी थे वे भी जल्दी से लौट गए! क्योंकि सभी शरद पूर्णिमा की तैयारी में व्यस्त थे! पूर्णा भी मानो इसी दिन की प्रतीक्षा में थी! उसको अपने सौंदर्य और यौवन का अभिमान था और उसे निखारना ही उसके जीवन का लक्ष्य था! आज तो वह विशेष श्रृंगार कर नगर की शोभा देखने और अपनी दिखाने निकली थी! पर हर ओर युवक-युवतियों के हास्य विनोद की गूंज सुन उसकी विरह वेदना बढ़ गई और वह शीघ्र ही घर लौट आई! घर पहुंचकर वह छत पर चढ़ गई और घंटों खडी़ रही! वह आकाश को निहार रही थी और मन ही मन चांद से बाते कर रही थी! क्या तुम भी मेरी तरह अकेले हो? तुम्हें भी अपने प्रियतम की प्रतीक्षा है?अचानक उसकी नजर दूर उस उपवन पर पड़ी, जहां महात्मा बुद्ध ठहरे हुए थे!अचानक उसके मन में प्रश्न उछला, रात्रि के इस पहर में भी भिक्षु भ्रमण क्यों कर रहे हैं? अभी तक जागे हुए क्यों हैं?लगता है, ये बेचारे भी अपनी प्रियतमा के विरह से व्याकुल हैं! अब मन तो मन है, उसमें भावनाएं तो होंगी ही! पर इस तरह ढोंग करने की क्या जरूरत है? ये सब भिक्षु नहीं, ढो़गी पाखंडी हैं!
पूर्णा में पनपे इस मलिन विचार को जान लेने वाले अंतर्यामी तथागत अगले ही दिन अपने भिक्षुओं के साथ भिक्षाटन के लिये उसके घर आए! एक बार तो उसकी इच्छा हुई कि वह इन पाखंडियों को भगा दे! पर ज्यों ही तथागत के शांत मुख का दर्शन किया, तो खुद ही नत मस्तक हो भोजन का आमंत्रण दे बैठी! महात्मा बुद्ध ने भोजन ग्रहण करने के बाद उससे पूछा, तुम मेरे भिक्षुओं की निंदा क्यों करती हो? उसने कहा आपको भ्रम हुआ है, मैंने नेिंदा नहीं की!तथागत विनम्र भाव से बोले- रात्रि को मेरे भिक्षुओं को जागता हुआ देख, उनके विषय में क्या तुम्हारे मन में निंदित विचार नहीं आए थे? वह हैरान रह गई! तथागत तो उसके मन की बात को भी जान गए थे! महात्मा बुद्ध बोले हे पूर्णा, कल शरद पूर्णिमा की रात्रि में कहीं कोई विषयी जाग रहा था, तो कहीं विरही व्याकुल हो जाग रहा था! मेरे भिक्षु भी जाग रहे थे!क्रिया सब की एक थी, लेकिन लक्ष्य में महान अंतर था! शरद पूर्णिमा के अवसर पर भिक्षुओं के जागने का कारण आध्यात्मिक उन्नति और प्रभु प्राप्ति था, न कि विषय पूर्ति की अभिलाषा! वे आगे कहते हैं जो सदा जागरूक रहते हैं और दिन रात सीखते रहते हैं और निर्वाण ही जिनका एकमात्र उद्देश्य है, उनके ही पाप नष्ट होते हैं! इसलिए पूर्णा, शरीर और मन की सीमाओं से मुक्त होकर सर्वव्यापी चेतना में लीन होने के लिए जो उत्सुक हैं, जो जीवात्मा रूपी बूंद को सागर रुपी परमात्मा में विसर्जित कर देना चाहता है, ऐसे ही मनुष्य भव से पार होते हैं! पूर्णा को अपनी गलती का एहसास हुआ! उसकी जिंदगी में एक ऐसा उज्जवल दिन भी आया, जिसके प्रकाश से जागकर पूर्णा भी पूर्णता की ओर बढ़ गई!
*ओम् श्री आशुतोषाय नम:*
"श्री रमेश जी"
