सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
श्री आर सी सिंह जीसागर के पास कभी भी जल की कमी नहीं होती। मनुष्य जितना भी बड़ा घड़ा सागर में ले जाए, सागर कभी भी जल देने से मना नहीं करता। उसी तरह परमात्मा की दया /कृपा की बारिश अनादि काल से ही भौतिक प्रकृति के सभी जीवों के पात्रता रूपी बर्तन में हो ही रही है। हमें केवल अपनी पात्रता /योग्यता बनानी होती है, जो निरन्तर ध्यान साधना व सत्संग करते रहने से ही बनती है।
भौतिक प्रकृति में रहने वाले सभी जीवों के तीन प्रकार के शरीर होते हैं। स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर (मन बुद्धि) और कारण शरीर (कर्माशय स्वभाव)।लेकिन मनुष्य योनि पाकर ध्यान साधना व सत्संग करते रहने से ही हम इनका बोध कर सकते हैं। अर्थात इनके महत्व को समझ सकते हैं। अन्यथा ऐसा देखा जाता है कि युवा अवस्था में होने वाली विवाह स्थूल शरीर को देखकर ही होते हैं। मन के विचार व स्वभाव हम समझ नहीं पाते। इसीलिए इसके परिणाम आजकल हम कोर्ट-कचहरी में देख ही रहे हैं।
सृष्टि के आरम्भ से ही वेद हैं। वेदों में ही बताया गया है कि मनुष्य को अपने जीवन में क्या-क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना। अर्थात यह करो और यह मत करो। यानी कि विधि विधान द्वारा कर्म करने से ही सुख की प्राप्ति होती है। और निषेध कर्म करने से भविष्य में दुख की प्राप्ति अवश्य ही होती है। इसलिए हमारा कोई भी कर्म प्रकृति के किसी भी जीव के हित के विरुद्ध नहीं होना चाहिए। क्योंकि भौतिक प्रकृति सभी जीवों का कल्याण सुनिश्चित चाहती है।
*ओम् श्री आशुतोषाय नम:*
"श्री रमेश जी"
