श्री रामकृष्ण परमहंस के शिष्यों की साधना और सन्यास का प्रतिफल पूरे विश्व को ज्ञानामृत पिलाया।

 सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

                              श्री आर सी सिंह जी 

गंगा का तीर उधानगृह से गंगा में उतरने वाली सीढियों पर मां शारदा बैठी थी!  वे अठखेलियां करती लहरों को अपलक देख रही थी!  ठाकुर श्री रामकृष्ण परमहंस अपनी भौतिक देह त्याग चुके थे!वे सोच रही थीं- ठाकुर तो चले गये!  पर अपने पीछे इन पुत्रों को दर-दर भटकने को बाध्य कर गये!  अब क्या होगा नरेंद्र का, राखाल का, काली का... सबकी भिक्षुओं जैसी हालत हो गयी है!क्या जरूरत  थी इन सबसे इनकी नौकरियां और घर-बार छुड़वाने की यदि यूं ही अधर में बेसहारा छोड़कर जाना था?

श्री मां रोते-रोते तनिक रूष्ट सी हो गयी! पर तभी एक दिव्यानुभूति साकार हुई! मां ने देखा कि ठाकुर चिन्मय रूप में वहीं पर प्रकट हो गये!  बड़ी तेजी से दौड़ते हुए मंदिर की सीढियां उतरने लगे! देखते ही देखते, गंगा की शीतल लहरों में वे उतर आए! श्री मां हैरान होकर देखती जा रही थीं!  उन्हीं जल धाराओं से पुन: एक आकृति उठी!  पर यह क्या? वह आकृति ठाकुर की नहीं थी! नरेंद्र की थी!जय श्री रामकृष्ण का घोष करता हुआ नरेंद्र गंगा मैया की गोद में साकार हो गया!  उसी क्षण उसके समक्ष एक विशाल जनसमूह भी प्रकट हो गया!  नरेंद्र अपनी अंजुलि में गंगा जल भर कर और साथ ही जय श्री रामकृष्ण का उच्चारण करते हुए जनसमूह पर छींटे बरसाने लगा! जिस-जिस पर छींटे पड़ती, वही मुक्त होता जा रहा था!  कितना सजीव था यह दृश्य!  मानो वास्तविकता में सामने घटा हो!  परन्तु आसपास घाट पर किसी अन्य ने यह नहीं देखा था!  मात्र श्री मां की गदगद आंखों को यह दिव्यानुभूति हुई थी!  इसका साक्षात्कार करते ही उनके मन के समस्त झंझावत शान्त हो गये!  ठाकुर के शिष्यों का सुनहरा भविष्य,  उनकी साधना और सन्यास का प्रतिफल सब कुछ श्री मां ने देख लिया! सबसे बड़ी बात, भविष्य में वही सब घटा, जो श्री मां ने देखा था!  नरेंद्र और उसके गुरु-भाइयों ने विश्व को ज्ञानामृत पिलाया! 

*ओम् श्री आशुतोषाय नम:*

"श्री रमेश जी"

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