सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
श्री आर सी सिंह जीलाहिड़ी महाशय की एक शिष्या ने एक बार उनके समक्ष प्रार्थना रखी- गुरुदेव आप अपनी कोई तस्वीर देकर मुझे कृतार्थ करें! मेरी बड़ी इच्छा है कि मैं अपने घर में आप का स्वरूप लगाऊं! पुकार सच्चे हृदय से निकली थी और निस्वार्थ भाव से की गई थी, इसलिए जल्द ही स्वीकार कर ली गई!लाहिड़ी महाशय ने अपना स्वरूप उस शिष्या को दे दिया और कहा - यदि तुम इस स्वरूप को साक्षात मेरा ही रूप मानोगी, तो मैं सच में इस में विद्यमान रहकर तुम्हारी सुरक्षा करूंगा अन्यथा यह महज एक चित्र ही रहेगा! वह शिष्या खुशी - खुशी स्वरुप अपने घर ले आई और बिल्कुल सामने की दीवार पर उसे लगा दिया!एक दिन लाहिड़ी महाशय की पुत्रवधु और वह शिष्या दोनों एक साथ बाहर बैठकर श्रीमद्भागवत गीता का पाठ कर रहे थे! उनके पीछे ही लाहिडी़ महाशय का स्वरूप लगा था!अचानक आकाश में बहुत तेज बिजली कड़की! देखते ही देखते वहां जोरदार धम् की आवाज हुई- दरअसल उनके बिल्कुल पास में ही बिजली गिरी थी! वह शिष्या बुरी तरह घबरा गई! तुरंत स्वरूप के सामने झुकी और अपने गुरु के शब्दों को याद करते हुए कि यह तस्वीर मात्र स्वरूप नहीं, साक्षात वे स्वयं हैं- उसने रक्षा की आर्त्त पुकार की! बाद में वह शिष्या अपना अनुभव सांझा करते हुए कहती है- मैंने जैसे ही गुरुदेव के स्वरूप के सामने प्रार्थना की, ऐसा लगा जैसे मुझे चारों ओर से ठंडी बर्फ की चादर ने ढक लिया और बिजली के संपूर्ण ताप से बचा लिया! जो बिजली इतनी नजदीक गिरी थी, उसका अंश भर भी हम दोनों को छू नहीं पाया था...आहत नहीं कर सका था!
*ओम् श्री आशुतोषाय नम:*
"श्री रमेश जी"
