ज्ञानी पुरुष भगवत सेवा में सुखी रहता है और उसकी कोई इच्छा नहीं होती।

 सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

                                श्री आर सी सिंह जी 

श्रीमद्भगवत गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं, यद्यपि विशाल सागर में हमेशा जल रहता है किंतु वर्षा ऋतु में विशेषतया यह अधिकाधिक जल से भरता जाता है तो भी सागर उतने पर ही स्थिर रहता है,  ना तो वह विक्षुब्ध होता है और ना ही तट की सीमा का उल्लंघन करता है। ठीक ऐसी ही स्थिति ज्ञानी व्यक्ति की है। जब तक मनुष्य शरीर है तब तक इंद्रिय तृप्ति के लिए शरीर की मांगे बनी रहेंगी।  किंतु भक्त अपनी पूर्णता के कारण ऐसी इच्छा से कभी भी विचलित नहीं होता।  ज्ञानी व्यक्ति को किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं होती। क्योंकि भगवान उसकी सारी आवश्यकताएं पूरी करते रहते हैं।  इसलिए वह सागर के तुल्य होता है -अपने में सदैव पूर्ण। सागर में गिरने वाली नदियों के समान इच्छाएं उसके पास आ सकती हैं, किंतु वह अपने कार्य में स्थिर रहता है और इंद्रिय तृप्ति की इच्छा से बिल्कुल भी विचलित नहीं होता।  ब्रह्म ज्ञानी व्यक्ति का यही प्रमाण है -इच्छाओं के होते हुए भी वह इंद्रिय तृप्ति के लिए उन्मुख नहीं होता। क्योंकि वह भगवान की दिव्य भक्ति में संतुष्ट रहता है इसलिए वह समुंदर की भांति सिथर रहकर पूर्ण शांति का आनंद उठा सकता है।  किंतु दूसरे लोग, जो मुक्ति की सीमा तक इच्छाओं की पूर्ति करना चाहते हैं फिर भौतिक सफलताओं का क्या कहना -उन्हें कभी शांति नहीं मिल पाती।  ये सब सभी अपूर्ण इच्छाओं के कारण दुखी रहते हैं। किंतु ज्ञानी पुरुष भगवत सेवा में सुखी रहता है और उसकी कोई इच्छा नहीं होती। वस्तुतः वह तो भव बंधन से मोक्ष की भी कामना नहीं करता। ऐसे ज्ञान प्राप्त भक्तों की कोई भौतिक इच्छा नहीं रहती इसलिए वे पूर्ण शांत रहते हैं।

*ओम् श्री आशुतोषाय नम:*

"श्री रमेश जी"

Post a Comment

Previous Post Next Post