अंतरानुभूतियों को समझने के लिए आध्यात्मिक दृष्टि चाहिए।

 सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

                             श्री आर सी सिंह जी 

हिमालय की बर्फीली कंदराओं में ऋषि असित ध्यानमग्न थे!  एकाएक उनका अंतर्जगत उदभासित हो उठा!  दिव्य दृष्टि द्वारा उन्होंनेे देखा कि आकाश में देवगण नृत्य कर रहे हैं!  साथ ही, वे बुद्ध!बुद्ध!  शब्द की उदघोषना भी कर रहे हैं!यह दिव्य अनुभव देखकर ऋषि असित आनंदमग्न हो गए!  उनकी चेतना में प्रकाशित हुआ कि धरा पर महा बुद्ध ने अवतार ले लिया है!  क्यों ना मैं भी उनके दर्शन करने धरा पर जाऊं?  यही सोचकर ऋषि असित ने समस्त  जम्बूद्वीप का अपनी दिव्य-दृष्टि से अवलोकन किया! साक्षात्कार हुआ कि राजा शुद्धोदन के महल में ही यह अलौकिक सूर्य उदित हुआ है!  इसी के आधार पर असित हिमालय त्याग कर शाक्यों के नगर पहुंचे!ज्यों का त्यों यथार्थ में गठित पाया!  समस्त नगरी बुद्ध के आगमन से प्रकाशित थी!  राजा शुद्धोधन और महामाया के कुल का दीपक प्रज्वलित हो चुका था!

इस प्रकार की अनगिनत दिव्यानुभूतियां इतिहास के पृष्टों पर  दर्ज हैं!  यह अनुभूतियां पूर्ण गुरुओं के साधकों का मार्गदर्शन करती रही हैं!  वर्तमान में गुरूदेव श्री आशुतोष महाराज जी द्वारा ब्रह्मज्ञान में दीक्षित उनके शिष्यों का अंत:करण भी ऐसी ही दिव्यानुभूतियों से आलोकित रहता है तथा उनका सशक्त दिशा निर्देशन करता है!  आज  श्री गुरु आशुतोष महाराज जी के शिष्यों की एक नहीं, सहस्त्रों अंतरानुभूतियां यही मार्गदर्शन कर रही हैं कि श्री महाराज जी समाधि की स्थिति में हैं!  जिस प्रकार  विज्ञान के गूढ़ रहस्यों को वैज्ञानिक दृष्टि से ही समझा जा सकता है! वैसे ही अंतरानुभूतियों को समझने के लिए आध्यात्मिक दृष्टि चाहिए!  महाराष्ट्र के संत तुकाराम जी कहते हैं-

मछली पानी में कैसे सोती है-  इस रहस्य का अनुभव करने के लिए हमें उसी की योनि में जन्म लेना पड़ेगा!  इसी प्रकार गुरु भक्तों को जो अनुभूतियां होती हैं-  उनकी वास्तविकता जानने के लिए हमें भी भक्तों जैसे अवस्था को प्राप्त करना होगा। 

*ओम् श्री आशुतोषाय नम:*

"श्री रमेश जी"

Post a Comment

Previous Post Next Post