*तीन बंदर*

सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

                                श्री आर सी सिंह जी 

आज हर ओर हिंसा का बोलबाला है।  जिस ओर भी नजर जाती है वहीं वैमनस्य भरा नजारा दिखाई देता है। बस में सफर करते लोग छोटी- छोटी बातों पर झगड़ पड़ते हैं। अपशब्द बोलना तो दूर एक दूसरे को मारने पीटने तक को उतारू हो जाते हैं । सड़क पर अनजाने में ही वाहनों में हल्की सी टक्कर हो जाए तो भारी भरकम बवाल हो जाता है। चालक हाथापाई पर उतर आते हैं। समाज की ऐसी दुर्दशा को व्यक्त करते हुए महान मनीषी कहते हैं-  कैसी है ये उन्नति ये कैसी खोजबीन है ?

जिसको देखो अपनी स्वार्थ सिद्धि में ही लीन है।

आज के समाज का क्या बस यही विकास है कि आदमी को आदमी के रक्त की ही प्यास है!

अहिंसा, दया, क्षमा ये सब बिखर गए कहां?

सभ्यता के सारे मूल्य जा के मर गए कहां?

ये सभी तथ्य सिद्ध करते हैं कि समाज से अहिंसा परमो धर्म: की उक्ति लुप्त हो चुकी है।   हर ओर केवल पापाचार और हिंसा का ही बोलबाला है। ऐसे घोर परिदृश्य में एक प्रतीक बड़े मारके का है। वह है- तीन बंदरों की प्रतिमा।  तीन बंदर पढ़ते ही हमारे दिमाग में एक ही बात आती है- वही गांधी जी के तीन बंदर। यही सामान्य जानकारी है पर यहां हम आप की जानकारी को दुरूस्त करना चाहेंगे।  तीन बंदरों के प्रतीक में छिपे यथार्थ और सार्थकता को उजागर करना चाहेंगे। दरअसल इन तीन बंदरों का अस्तित्व सबसे पहले जापान में दिखाई दिया। यह चिन्ह 17 वी सदी में जापान के निक्को शहर में स्थित प्रसिद्ध तोशोगु मंदिर के दरवाजे पर नक्काशी के रूप में पाया गया।  यहां इन्हें तीन विवेकी बंदर या तीन अध्यात्मिक वानरों के नाम से जाना जाता है। जापान में तीन बंदरों को मुख्यत: इस प्रकार पुकारा जाता है कि-

मिजारू- आंखों को हाथों से ढके हुए बुरा ना देखने का प्रतीक!

किकाजारू-  कानों को हाथों से ढके हुए  बुरा ना सुनने का प्रतीक!

इवाजारू-  मुंह को हाथों से ढके हुए  बुरा ना बोलने का प्रतीक!

पर मुख्य बात है कि ये तीन बंदर मात्र प्रतीक रूप नहीं हैं।  बल्कि यह मनोविज्ञान और तंत्रिका संबंधी व्यवहारिक पक्ष की ओर इशारा करते हैं।वह यह है कि बुराई देखने व सुनने से भीतर प्रवेश कर जाती है।  हम जितनी बुराई और पाप को आंखों और कानों से ग्रहण करते हैं, उतनी ही दुष्टता हमारे भीतर प्रवेश कर जाती है। फिर एक ना एक दिन यही दुष्टता हिंसा बंनकर हमारे आचरण में अभिव्यक्त होती हैं। इन्हीं दुष्परिणामों के कारण जापान के महापुरुषों और गांधी जी ने तीन बंदरों के संकेत द्वारा समाज को संदेश दिया कि आंखों और कानों के जरिए अपने भीतर बुराई को एकत्र मत करो, तो मुख के जरिए स्वंयं ही बुरा नहीं निकलेगा। या यूं कहें कि अपनी इंद्रियों को हिंसा और बुराई रूपी सर्पों से विमुख कर दो।

पर वहीं ,भारत की वैदिक संस्कृति यहीं तक सीमित नहीं थी। हमारे ऋषियों ने इससे भी आगे की गूढ़ बात की।  उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल आंखों और कानों को बुरे दृश्य से दूर रखना तथा मुख से अपशब्द ना बोलना ही पर्याप्त नहीं है, अपितु इंद्रियों पर सहज संयम होना भी आवश्यक है। यह तभी होगा जब हम आत्मा के बारे में जानेंगे। यही कारण है तत्व ज्ञानी संतो महापुरुषों ने आत्मा को जानने पर बल दिया। क्योंकि यदि आत्मा जागृत होगी तो बुद्धि आत्मा के, मन बुद्धि के, और इंद्रियां मन के नियंत्रण में खुद ही आ जाएंगी। तब हमारा संपूर्ण स्वरूप आत्मा से संचालित होगा। इसलिए उसके द्वारा संचालित हो कर इंद्रियों द्वारा बुरे विचारों का संग्रहण नहीं होगा। हमें हठपूर्वक संयम धारण करने की जरूरत नहीं पड़ती। परंतु मुख्य प्रश्न यह है कि आत्म जागृति कैसे संभव है? हम किस प्रकार आत्मा को जान सकते हैं? इस प्रश्न का मात्र उत्तर ही नहीं अपितु समाधान है ब्रह्म ज्ञान!  जब हम पूर्ण सतगुरु द्वारा ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करते हैं तो हमारी जन्मों से सोई हुई आत्मा जागृत होती है। हमें अपने आप का बोध हो जाता है। उसके बाद स्वत: ही इंद्रियों, मन और बुद्धि की कमान आत्मा के हाथों में आ जाती है। फलस्वरूप आत्मा के नियंत्रण में इंद्रियां बुराई हिंसा या नकारात्मकता की ओर आकर्षित ना होकर मात्र पवित्रता ही ग्रहण करती हैं। तभी तो ब्रह्म ज्ञान को पावनता का स्त्रोत कहा गया -यानी कि संपूर्ण संसार में ब्रह्मज्ञान के समान कोई और साधन नहीं है जिसके द्वारा मनुष्य पवित्रता को अपने आचरण में डाल सकें। पावन और सुंदर व्यवहार करने का एकमात्र मार्ग ब्रह्मज्ञान की ध्यान साधना से होकर गुजरता है।  तभी तो हमारे दिव्य गुरुदेव श्री आशुतोष महाराज जी ने ब्रह्मज्ञान को कुछ इस प्रकार महिमामंडित किया-

"न शांति के गीत हैं, न प्रेम का प्रकाश है।

ब्रह्म ज्ञान के बिना विनाश ही विनाश है।"

*ओम् श्री आशुतोषाय नम:*

"श्री रमेश जी"

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