सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
जो ईश्वर पर पूर्णतः निर्भर होता है, ईश्वर भी उसके समस्त उत्तरदायित्व वहन करते हैं। जिस प्रकार एक मां अपने बालक की पूरी जिम्मेदारी निभाती है, उसी प्रकार गुरु भी ऐसी माँ है जो अपने शिष्य रूपी बालक की छोटी से छोटी वस्तु का ध्यान रखता है।
लेकिन समर्पण और सतर्कता-- ये दोनों गुण शिष्य में भी तो होने चाहिए। तभी गुरु अपना दायित्व निभा पाता है। तभी तो यह सम्बंध पूर्ण होता है। बालक को भी तो चाहिए कि वह अपनी मां का हाथ पकड़कर चले। क्योंकि गुरु का हाथ थामकर चलने वाले साधक को ही गुरु मार्गदर्शन दे पाता है।
गुरुदेव अपने यंत्र स्वयं चुना करते हैं। यह चयन गुरु-सत्ता बड़े सूक्ष्म स्तर पर करती है। बस चुपचाप चुनाव हो जाता है। जिसे केवल चुनने वाला और चुने जाने वाला जान पाता है।
**ओम् श्रीआशुतोषाय नमः**
"श्री रमेश जी"
