सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
समाज अक्सर कह बैठता है कि सारे बाबा एक जैसे होते हैं। किसी गुरु-वुरु के पास क्या जाना। सबके सब श्रद्धालुओं को ठगते हैं।नि:संदेह, कुछ प्रपंची तथाकथित गुरुओं के कारण ऐसी अवधारणा का बनना स्वाभाविक है।
परंतु इस दृश्य का दूसरा पहलू भी है- हमारी स्वयं की खोज कैसी है? खोज के बिंदु क्या हैं? जब हम किसी गुरु की ओर बढ़ते हैं तो उनसे सत्य/ईश्वर पाने हेतु या संसार की वस्तुओं के लिए? इच्छाओं की आग लेकर गुरु ढूँढ़ते हैं या वैराग्य का सूरज लेकर? उनसे धन- सम्बंध माँगते हैं या ईश्वर?
यदि ध्येय संसार है, माया है, तो स्वाभाविक है कि गुरु के नाम पर ढोंगी पाखंडियों का मायावी शिकंजा आपके लिए तैयार है।इसलिए दोष सिर्फ पाखंडी बाबाओं का नहीं है। हमारी पाखंड पूर्ण खोज, अंधी श्रद्धा और विश्वास भी बराबर की जिम्मेदार है।
खोज हो तो नरेन्द्र (स्वामी विवेकानंद जी) जैसी... जिसकी एक ही हूक थी- "मुझे ईश्वर चाहिए!".. साक्षात् ईश्वर!.. ईश्वर का दर्शन! ऐसी खोज कहीं किसी प्रपंच में नहीं उलझी।सीधे पूर्ण गुरु रामकृष्ण परमहंस के चरणों में पहुंचकर ही रुकी।
**ओम् श्रीआशुतोषाय नमः**
"श्री रमेश जी"
