सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
जो लोग स्वहित (आत्महित) व परहित- दोनों में संलग्न होते हैं वे श्रेष्ठतम हैं, उत्तम हैं। जैसे गौ से दूध निकलता है, दूध से दही, दही से मक्खन, मक्खन से घी श्रेष्ठतम है। वैसे ही ये लोग श्रेष्ठतम हैं।
स्वहित व परहित क्या है?
आत्महित का अर्थ होता है-- अपने राग द्वेष, मोह, क्रोध, लोभ, मद, अहंकार को जीतने का प्रयास करना। वहीं पर परहित का अर्थ होता है-- दूसरों को राग द्वेष, मोह, क्रोध, लोभ, मद, अहंकार को जीतने की प्रेरणा देना।
आत्महित का अभिप्राय होता है-- स्वयं सदुपदेश को श्रवण करना, मनन करना, धारण करना, तदनुसार आचरण करना। वहीं परहित का अभिप्राय होता है-- दूसरों को सुंदर व प्रेरणाप्रद उपदेश देना। अपने संपर्क में आने वालों को सही मार्ग दिखाना, उत्साहित करना, व प्रसन्न करना।
आत्महित में लगा हुआ व्यक्ति स्वयं प्राणी-हिंसा से, चोरी करने से, झूठ बोलने से, नशीली चिजों का सेवन करने से विरत रहता है। वहीं परहित में लगा हुआ व्यक्ति अन्य लोगों को जीव हिंसा, चोरी, सुरा, तम्बाकू आदि का सेवन न करने की प्रेरणा देता है।
अत: यह स्पष्ट है कि वही जीव श्रेष्ठ है जो सर्वप्रथम स्वहित करता है, तदोपरांत परहित के लिए अग्रसर होता है।
**ओम् श्रीआशुतोषाय नम:**
"श्री रमेश जी"
