•कथा सुनने के लिए संपूर्ण दिन उभरता रहा जन सैलाव
•प्रेम, दया, करुणा, उदारता संगीत कला, साहित्य, भाव संवेदना, त्याग, वात्सल्य का गुण यदि व्यक्ति में नहीं है तो मनुष्य साक्षात पशु के सदृश- है कथा व्यास श्री ब्रह्मचारी कौशिक चैतन्य जी महाराज
• कथा में आदि गुरु शंकराचार्य राजा दशरथ महल के महंत समेत संतोष उपाध्याय संतोषी (ज्योतिषी) समेत कई विद्वानों ने शिरकत किया।
कथा की अन्य झलकियां•बाराबंकी। ब्लाक सिद्धौर की ग्राम सभा बीबीपुर में चल रही सात दिवसीय श्रीमद् भागवत कथा एवं विष्णु महायज्ञ की पूर्णाहुति, विसर्जन, शांतिपाठ देव शक्तियों की विदाई, शंख ध्वनि के साथ शानदार ढंग से समापन हो गया। उक्त आयोजन के संयोजक भगवती प्रसाद सोनी एवं श्रीमती विजयलक्ष्मी सोनी द्वारा बड़े ही श्रद्धाभाव के साथ कथा का श्रवण किया। विगत 2 नवंबर को भव्य कलश यात्रा के साथ कथा की शुरुआत हुई जिसमें कथा व्यास के रूप में चिन्मय मिशन के संस्थापक परम पूज्य ब्रह्मचारी कौशिक चैतन्य जी महाराज ने श्रोताओं को श्रीमद् भागवत में आने वाले कई मार्मिक प्रसंगों को सुनाकर आम जनमानस को भाव विभोर कर दिया कथा के दौरान कौशिक चैतन्य जी महाराज ने कहा गोपियों का श्री कृष्ण के प्रति वात्सल्य, स्नेह, ममत्व का प्रेम था। गोपियां कृष्ण को जगत में व्याप्त ईश्वरीय चेतना के रूप में देखती थी। कृष्ण का स्मरण कलमस को हटाने वाला है "प्रेमी से बिछड़ जाने के बाद उसके जीवन में बिताया गया समय ही यादें हो जाती हैं" प्रेम रूपी पवित्र वस्तु को गंदा ना करें आजकल पाखंडी कुछ कथा वाचकों ने प्रेम शब्द की परिभाषा को वासना से जोड़ दिया है। जब कृष्ण बलराम को ले जाने के लिए अक्रूर जी मथुरा से आए हैं और नंदबाबा यशोदा मैया से अनुरोध करके रथ में बैठ कर चल दिए उस समय ब्रज की गोपियां रथ के आगे लेट गई बोली हमारे ऊपर रथ को चढ़ा दो। अक्रूर जी अवाक रह गए। तब योगेश्वर श्री कृष्ण ने गोपियों से कहा कि गोपियां रास्ता खाली कर दो मुझे मथुरा जाना है। कृष्ण के मुख से इतना सुनते ही गोपियां खड़ी हो गई रस्ते को छोड़ दिया। कुछ गोपी आपस में चर्चा करने लगी कि हम लोगों ने कृष्ण से प्रेम किया है लेकिन कृष्ण ने हमसे प्रेम नहीं किया है। वह गोपियों का वात्सल्य प्रेम था। इस अवसर पर आर्गन गायक रघुपति तिवारी, तबला वादक राहुल शुक्ला, राजकुमार बैंजो, चंदन शुक्ला पैड तथा आचार्य योगेश त्रिपाठी, देवेश शुक्ला देवेश पाठक, सत्यम शर्मा, कैलाश दीक्षित द्वारा प्रस्तुत गीत "जा रहे हो तो जाओ ब्रज छोड़कर सबका दिल तोड़ कर, ऐसे प्रेमी कन्हैया नहीं पाओगे" काफी सराहा गया। उक्त सात दिवसीय कथा में भगवान कृष्ण की बाल्य लीला में उखल बंधन, माखन चोरी, यमलार्जुन वृक्षों का उद्धार, नलकूबर का उद्धार, अघासुर वध, बकासुर वध, चीर हरण, महारास लीला, कालिया नाग का वध, गिरिराज गोवर्धन पूजा, नंदोत्सव, कुब्जा पर कृपा के साथ पापाचारी अनाचारी कंस वध की कथा का विस्तृत रसपान उपस्थित भक्तों को कराया गया। भगवान कृष्ण का माता रुक्मणी के साथ विवाह, शिशुपाल वध सहित ज्ञान का अहंकार करने वाले भक्त उद्धव को गोकुल में भेज कर बृज की गोपियों को प्रेम के वास्तविक रूप का बोध कराना आदि कई मार्मिक प्रसंगो को पंडाल में मौजूद श्रोताओं को सुनाया गया।
कथा को गति प्रदान करते हुए ब्रह्मचारी कौशिक चैतन्य जी ने बताया कि उद्धव जब गोपियों को ज्ञान देने ब्रज में जाते हैं तो गोपियां कहती हैं "उद्धव मन न भये दस बीस एक हुतो सो गयो श्याम संग को आराधे इश।" जिसने अपनी समस्त इंद्रियों को अपने बस में कर लिया है उसका नाम गोपी है "मैं तो गोवर्धन को जाऊंगी नहि माने मेरा मनुवा।"
भजन को बड़े ही भाव पूर्वक गायन किया गया। भगवान अपने भक्तों के दुर्गुणों को दूर करते हैं, कलुसित संस्कारों को समाप्त कर देते हैं। लेकिन हमारे पात्र में कमी है भगवान में कमी नहीं है। वृंदावन में प्रेम की अनुभूति होती है वृंदावन भगवान कृष्ण का हृदय है।
उपरोक्त श्रीमद्भागवत कथा में अपने उदगार व्यक्त करते हुए कथा व्यास जी ने बताया कि पतित से पतित व्यक्ति भी यदि अंत में प्रभु का नाम लेता है तो वह अंत में मोक्ष को प्राप्त हो जाता है। व्यक्ति के जीवन में हर स्थिति मैं प्रभु का स्मरण बना रहे जीवन का प्रत्येक भाव प्रभु को समर्पित रहे जो भगवान के समीप जाता है उसको भगवान के कृपा की अनुभूति होती है। जन्म के समय और मृत्यु के समय असहनीय दुख होता है। इस मौके पर गायको द्वारा प्रस्तुत भजन "तेरा साथ निभाएगा विश्वास जरूरी है, तेरी बिगड़ी बनाएगा विश्वास जरूरी है"क्या भरोसा है इस जिंदगी का, साथ देती नहीं है किसी का काफी सराहा गया। श्री व्यास जी ने कथा के अंतिम दिन श्री कृष्णा और भक्त सुदामा के प्रसंग का वर्णन करते हुए बताया भगवान का भक्त कभी गरीब नहीं होता अभावग्रस्त हो सकता है। भक्त सुदामा जैसी मित्रता होनी चाहिए जिंदगी में स्वार्थी नहीं। भगवान केवल भाव के भूखे होते हैं "जितना राधा रोई रोई कान्हा के लिए कन्हैया उतना रोए रोए हैं सुदामा के लिए", "मैंने सारे सहारे छोड़ दिए एक तेरा सहारा काफी है"। सुदामा की धर्मपत्नी सुशीला ने द्वारकाधीश के पास जाकर मिलने के लिए प्रेरित किया था सुदामा जी को। कृष्ण और सुदामा जी का प्रसंग एक सच्चे मित्रवत व्यवहार की प्रेरणा प्रदान करता है। उक्त कथा में कौशिक चैतन्य जी ने जन्मेजय द्वारा किए गए सर्प यज्ञ की कथा के साथ भागवत में सात दिनों तक कथा सुनने वाले राजा परीक्षित के मोक्ष का वर्णन भी किया।
सात दिवस तक चली उक्त कथा में प्रतिदिन कोई ना कोई विद्वान महापुरुष व विशिष्ट अतिथियों का आगमन होता रहा। जिसमें अयोध्या के राजा दशरथ महल के महंत जगतगुरु श्री राम भूषण कृपालु जी महाराज, श्री राम पीठाधीश्वर के महंत, जयराम दास जी पुजारी राम नंदन दास जी महाराज सहित पूज्य गुरुदेव शंकराचार्य जी महाराज व विश्व विख्यात ज्योतिषी आचार्य संतोष कुमार उपाध्याय (संतोषी) व सेवा निवृत्त कैप्टन संतोष द्विवेदी जी सहित कई गणमान्य लोगों ने प्रतिभाग किया। उक्त कार्यक्रम को सफल बनाने में विनय कुमार सोनी, विकास सोनी, राजेश सोनी, राजू सोनी,जितिन सोनी, गोपाल सोनी, मोनू सोनी, गौरव सोनी सहित समस्त ग्रामवासी प्राणपण से जुटे रहे।
उमाकांत बाजपेयी
मीडिया प्रभारी

