**मनुष्य में प्रकृति ने अद्भुत क्षमता भरी है।**

सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

धन सम्पत्ति को यदि हम मर्यादा का मूल्यांकन करने के लिए अपनी तुला बनाएंगे तो धर्म के लिए वहाँ कोई स्थान नहीं होगा।धन सम्पत्ति से उपर भी कुछ है, जो सूक्ष्म है। उस सूक्ष्म तत्व को अनुभव करना होगा।

   संसार में मनुष्य ही ऐसा प्राणी है, जिसे बहुत सीखना पड़ता है। प्रकृति ने उसे पूरा मनुष्य बनाकर नहीं भेजा। मनुष्य सदा अधूरा ही आता है।

   प्रकृति ने पशु को पूर्ण बनाया है। आप पशुओं के बच्चे को पानी में फेंक दीजिये। उनमें से अधिकांशतः तैरकर किनारे पर आ जाएंगे। केवल मनुष्य ही ऐसा है जो डूब जाएगा। पानी से बाहर आने के लिए उसे तैरने की कला सीखनी पड़ती है। उसे तैरना प्रकृति ने वरदान में नहीं दिया। वह उसे सीखना पड़ता है।

   मनुष्य में प्रकृति ने अद्भुत क्षमता भरी है। उन क्षमताओं को, उन शक्तियों को प्रकृति ने सुला दिया है।हमें सजग रहने की साधना के द्वारा उनको जगाना है।जैसे जैसे वे शक्तियां जागती जाती हैं... हम अंश से पूर्ण की यात्रा की ओर बढ़ते जाते हैं। और अंततः वह पूर्ण हमारे माध्यम से स्वयं को प्रकट कर देता है।यानि हम अपने उस पूर्ण स्वरूप को प्रकट कर देते हैं।

  आपने सदा लोगों को किसी के सम्बंध में यह कहते सुना होगा कि वह व्यक्ति तो पशु से भी अधिक गिरा हुआ है। कभी किसी पशु के विषय में यह नहीं सुना होगा कि वह पशुओं से भी गिरा हुआ है।उसके गिरने उठने की संभवनाएं समाप्त हो जाती हैं। विकास का क्रम वहाँ नहीं है। वहाँ केवल भोग है।वह केवल भोग योनि है।

  किंतु मनुष्य के सम्बंध में विकास की पूरी पूरी संभवनाएं हैं। उसके पास आगे की यात्रा है, जो पशु के पास नहीं है। मनुष्य के पास मनुष्यत्व, देवत्व और अंततः ईश्वरत्व की यात्रा बची होती है, जिसे पूरा करने के लिए उसे मानव शरीर दी जाती है। इस देह के माध्यम से उसे वह विज्ञान दिया जाता है, जिससे वह अपनी ईश्वरत्व की यात्रा को पूरी कर सके।उस विज्ञान का नाम "आध्यात्म" है।

    मानव देह का होना ऐसे है, जैसे हमारे हाथ में एक ऐसी पहेली दे दी गई हो, जिसका हल उसी में छिपा हो। हमें बस इतना करना है कि जो छिपा है, उसे उघाड़ना है। इस उघाड़ने की प्रक्रिया में जो भी होता है, उसे साधना कहते हैं, तपस्या कहते हैं।                                

  **ओम् श्रीआशुतोषाय नमः**

        "श्री रमेश जी"

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