**सांसारिक तौर तरीकों और गुरु की कार्यशैली में बहुत अंतर होता है।**

 सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

 सर्वसमर्थ गुरु यदि चाहें, तो चुटकियों में विजय का सेहरा अपने शिष्य के सिर बाँध सकते हैं। परन्तु वे ऐसा नहीं करते। कारण कि वे अपने शिष्य का पूर्ण उत्थान चाहते हैं। अतः उसकी बाह्य जीत के साथ साथ, वे उसके आंतरिक विकास को लेकर भी प्रयत्नशील होते हैं। इसलिए जब उन्हें अपने शिष्य को किसी बड़ी उपलब्धि का श्रेय देना होता है, तो उससे पहले वे उसका सामना छोटी हार अथवा कठिनाइयों से करवाते हैं..। उन परिस्थितियों का निर्माण करते हैं, जो उसे उसकी असमर्थता व अपूर्णता का अहसास कराती हैं। ये वे क्षण होते हैं, जब वह गुरु चरणों में पूर्ण रूप से अपना समर्पण कर देता है। उसके मान सम्मान की लड़ाई, गुरु के मान सम्मान के चिंतन में बदल जाती है अर्थात उसकी पूरी विचार शैली ही परिवर्तित हो जाती है। ऐसे में उसका कर्म निष्काम कर्म बन जाता है। जब शिष्य पूर्ण समर्पण करके, चिंतन को अपने गुरुदेव के साथ जोड़ देता है, तब वह गुरु के दिव्य कार्य को करने के लिए सज्ज हो पाता है। तब गुरु उसे निमित्त बनाकर, अपना कार्य सम्पन्न करा लेते हैं। उसे सम्पूर्ण श्रेय देकर अपनी दिव्य कृपा से निहाल कर देते हैं। उस श्रेय को पाकर फिर शिष्य में अहंकार नहीं आता क्योंकि वह भली भांति जानता है कि वह कार्य उसकी योग्यता से नहीं, बल्कि केवल और केवल गुरु कृपा से संभव हो पाया है।

    यही कहलाती है-- दिव्य गुरु की दिव्य योजना-- जो हर युग में रची गई है... आज भी रची जा रही है... और आगे भी आकार लेती रहेगी।                           

 **ओम् श्री आशुतोषाय नमः**

"श्री रमेश जी"

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