सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
एक बार 'वन्दे-मातरम' के रचयिता बंकिमचंद्र चटर्जी की भेंट ठाकुर श्री राम कृष्ण परमहंस जी से हुई।ठाकुर ने उनसे पूछा- 'आपके अनुसार जीवन का उद्देश्य क्या है? 'बंकिमचंद्र तपाक से बोले- 'समाज की सेवा करना, दूसरों का भला करना, सबके लिए अच्छा सोचना व करना- यही जीवन का उद्देश्य है।' जैसे ही ठाकुर ने यह सुना, तो कड़कते हुए स्वरों में बोले- 'इतने महान जीवन का उद्देश्य भला इतना छोटा कैसे हो सकता है? यह सब जो आपने बताया, वह तो मानव जीवन का कर्तव्य है।जीवन का लक्ष्य नहीं।'
हममें से अधिकतर लोग भी यही चूक कर जाते हैं।अगर कोई हमें अध्यात्म की ओर प्रेरित करता है, तो अक्सर हम यही कह देते हैं- 'किसी का मन न दुखाओ, किसी का बुरा मत करो, सबका अच्छा करो, यही काफी है। यही भक्ति भजन सब है।
गुरुदेव श्री आशुतोष महाराज जी इसी तथ्य को बहुत ही सटीक व वैज्ञानिक उदाहरण से समझाते हुए कहते हैं- 'जब एक उपग्रह प्रक्षेपित करना होता है, तो रॉकेट के माध्यम से उसे अंतरिक्ष में ले जाया जाता है। इसमें दिलचस्प बात यह होती है कि उपग्रह (satellite) रॉकेट की नोक (tip) पर स्थापित होता है।सबसे ऊपरी सिरे पर। बाकी सारे हिस्सों में ईंधन भरा जाता है। जैसे जैसे रॉकेट ऊपर उठता है, उसका ईंधन खर्च होता जाता है और खाली हुए हिस्सों को वह नीचे गिराता जाता है। अंततः केवल रॉकेट की नोक पर स्थापित उपग्रह ही अंतरिक्ष में पहुँचता है। इसी प्रकार दूसरों का अच्छा करना, किसी का बुरा न करना, समाज सेवा करना- ये सब ईंधन की तरह हैं, जो जीवन लक्ष्य को पाने में हमारे सहायक हैं। ये सब निःसंदेह आवश्यक हैं। पर सिर्फ अच्छाई तक ही सीमित हो जाना ही ठीक नहीं।अध्यात्म की परिभाषा को नैतिकता तक संकुचित कर देना उचित नहीं। जीवन का लक्ष्य तो उससे भी ऊँचा, कहीं ऊँचा है। अपनी जीवात्मा रूपी उपग्रह को ब्रह्म रूपी अंतरिक्ष में स्थापित या स्थित करना- यही जीवन का वास्तविक ध्येय है।'
**ओम् श्री आशुतोषाय नमः*
"श्री रमेश जी"
