**शरणागति के दिव्य महत्व**

 सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

भारद्वाज संहिता में रानी कयाधु और उनके गुरुदेव नारद मुनि जी के बीच एक एक दिव्य संवाद वर्णित है।देवी कयाधु हिरण्यकश्यपु की पत्नी और प्रह्लाद की माता थीं। रानी कयाधु अपने गुरुदेव से शरणागति के दिव्य महत्व को समझाने के लिए कहती हैं।

नारदजी- हे देवी! शरणागति के 6 अंग होते हैं।

1. अपने गुरु (भगवान) की अनुकूलता का संकल्प करना! गुरु केवल एक दैहिक मूरत नहीं होते। गुरु ज्ञान हैं, गुरु आदर्श हैं और गुरु सिद्धान्त हैं।

2. गुरु (भगवान) की प्रतिकूलता का वर्जन करना! साधना मार्ग पर चलते हुए प्रतिकूल विचार व व्यवहार हमें गुरु से विमुख कर दिया करते हैं। इसलिए हर वह विचार जो मार्ग से भटकाने वाला,भरमाने वाला हो- उसका वर्जन माने प्रतिकार करने में ही शिष्य के शिष्यत्व की जीत है।

3. गुरु (भगवान) अवश्य मेरी रक्षा करेंगे, ऐसा दृढ़ विश्वास रखना!शरणागत साधक के भीतर यह प्रबल विश्वास होना चाहिए कि हर परिस्थिति में मेरे आराध्य मेरे  साथ हैं। विश्वास उस पक्षी के समान है, जो अंधकार में भी भोर के प्रकाश का अनुभव करता है और चहचहाता रहता है।

4. अनन्य भाव से गुरु (भगवान) का वरण करना! 'अनन्य' यानि जहाँ कोई अन्य न हो।सबकी आस छोड़कर जैसे वरण किया था द्रौपदी ने अपने गुरु कृष्ण का।

5. भगवद चरणारविन्द में आत्मसमर्पण करना! गुरुदेव श्री आशुतोष महाराज जी कहा करते हैं- 'समर्पण एक ऐसी अवस्था है, जहाँ अपने साध्य के सान्निध्य के बिना एक क्षण भी रहना असंभव हो जाता है।ऐसा सतत स्मरण कि साधक साध्य में जीता है। जब ऐसी अवस्था आती है, तब साध्य या गुरु की प्रत्येक इच्छा शिष्य की इच्छा बन जाती है।' आत्म समर्पण के इन्हीं भावों को एक भक्त ने कहा--

'जो मर कर भी न छूटेगी, अब तू बना वो आदत है।

तू कुछ हँसी में भी कह दे, मेरे लिए वो आयत है।।'

6. अपने आपको सर्वथा असमर्थ जानना!ठाकुर श्री रामकृष्ण परमहंस जी के शिष्य लाटू एक दिन ठाकुर से बोले- 'ठाकुर, मुझे सत्य का प्रचार करना नहीं आता।'    ठाकुर ने कहा- 'तेरे लिए मैं हूँ न!' असमर्थ को समर्थ का साथ मिला। लाटू स्वामी अद्भुतानंद बन गए।

   बड़ा सरल सा गणित है--

'जो खुद को बहुत कुछ समझता है,

उसे कैसे कुछ मिल सकता है?

जो खुद को कुछ नहीं समझता, 

सामर्थ्यवान उसी पर कृपा करता है!

**ओम् श्री आशुतोषाय नमः**

"श्री रमेश जी"

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