सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा वर्षा
शिवालय में शिवलिंग के ऊपर टंगा पीतल का पात्र। उस शिवलिंग पर बूंद -बूंद टपकता जल। यह दृश्य आपने सामान्यत: भगवान शिव से संबंधित मंदिर और पूजा स्थल पर देखा होगा। आध्यात्मिक शैली में इसे 'जलाभिषेक' कहा जाता है। किंतु यही इसका पूरा पहलू नहीं है। इस परिदृश्य का विज्ञान से भी प्राचीन नाता है। शिवलिंग के ऊपर जल से भरा पात्र टांगने के विचार कहां से जन्मा? इन्हीं भिन्न पहलुओं के बीच बुद्धिजीवी इतिहासकारों व वैज्ञानिकों द्वारा भी प्रचलित एकमत है। वे बताते हैं कि शिवलिंग के ऊपर लटका जल- पात्र एक प्रकार की जल घड़ी (water clock) है इसका आविष्कार वराहमिहिर ने किया था। उज्जैन में जन्म लेने वाले वराहमिहिर एक महान दार्शनिक, गणितज्ञ व खगोलज्ञ थे। कहा जाता है कि जब वराहमिहिर ने इस आदितीय जल घड़ी का आविष्कार किया, तो पहले भेंट भगवान को अर्पित करने की उनमें चाहत जागी। अतः उन्होंने काशी स्थित शिव मंदिर में जाकर अपनी उपलब्धि को भगवान शिव के चरणों में समर्पित कर दिया।
मंदिर के पंडित जी इस प्रख्यात आविष्कार की प्रतिष्ठा व आस्था का पूरा सम्मान बनाए रखना चाहते थे। इसलिए पंडित जी ने उनकी भेंट को शिवलिंग के ऊपर कुछ ऊंचाई पर स्थापित कर दिया। जल- पात्र से बूंद -बूंद करके जल शिवलिंग पर टपकता रहेगा और भगवान शिव का जलाभिषेक होता रहेगा ।
*ऊपरि कूपु गगन पनिहारी अम्रितु पीवणहारा*।
*जिस की रचना सो विधि जाणै गुरमुखि गिआनु वीचारा।।*(आदि ग्रंथ पृ (१३३१)
सिर के शिरों भाग अर्थात गगन में ही वह अमृत से भारा कुप(कुआं) है और वहीं पर बूंद -बूंद अमृत पीने वाली पनिहारीन (शिवमय) आत्मा है। यह अंतर्जगत का एक गूढ़ रहस्य है। यह केवल सद्गुरु द्वारा ब्रह्मज्ञान में दीक्षित गुरमुख ही जान सकता है।
सारत: संभवत यह घटना एक ब्रह्मज्ञानी साधक के आंतरिक अनुभव का परिणाम थी। पंडित जी ने सोच -समझकर कर ही ऐसा किया होगा, ताकि समाज को अंतर्जगत के इस रहस्य का प्रतीकात्मक संदेश मिलता रहे।
ॐ श्रीं आशुतोषाय नमः
श्री सियाबिहारी जी ✍️
