**ध्यान साधना परमात्मा में अपने अस्तित्व को विलीन कर देने के लिए की जाती है।**

 सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

साधक - गुरुदेव, कहा जाता है कि हमें हर कार्य इष्ट के लिए ही करना चाहिए। पर हम साधना तो स्व-कल्याण के लिए करते हैं। तो फिर यह तो स्वार्थ हुआ। क्या यह गलत है?

महर्षि अरविंद- ध्यान साधना कभी भी स्वार्थ के लिए नहीं की जाती है। जो साधना स्वार्थ सिद्धि के लिए, नाम ख्याति के लिए, की जाती है... वह लक्ष्य से भटकी हुई साधना है। जो लक्ष्य पर केन्द्रित साधना है, वह बनने के लिए नहीं बल्कि मिटने के लिए की जाती है। वह अपने अस्तित्व को आकार देने के लिए नहीं, बल्कि उस एक परमात्मा में याने अपने इष्ट में अपने अस्तित्व को विलीन कर देने के लिए की जाती है। वह अपने आपको पूर्ण रूप से सिद्ध करने के लिए नहीं, बल्कि उस पूर्ण में पूर्णत: समर्पित हो जाने के लिए की जाती है। और यह जो साधना पूर्णत्व को पाने के लिए की जाती है, यह स्वार्थ नहीं है। यह तो इष्ट की ही कामना पूर्ति है।                         

   **ओम् श्री आशुतोषाय नम :**

           "श्री रमेश जी"

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