**ऋषि मनीषियों ने हम जन मानस को ब्रह्ममुहूर्त में उठने और रात्रि में शयन करने का उपदेश दिया है।**

सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

जब हम विदेश जाते हैं, तो अक्सर जेटलेग (भिन्न समय क्षेत्रों की यात्रा के कारण उत्पन्न अस्थायी निद्रा विकार) की समस्या से जूझते हैं। दरअसल एक देश से दूसरे देश में टाइम जोन (समय क्षेत्र) भिन्न होने के कारण हमें इस समस्या का सामना करना पड़ता है।

   पर अब तो भारत देश में ही विदेश आ बसा है। अमेरिकन, यूरोपियन, ब्रिटिश कंपनियों की शाखाएं भारत में खुल गई हैं, जिनमें भारतीय युवाओं को नौकरियाँ दी जाती हैं। भारत और इन देशों के टाइम जोन विपरीत होने से उनके दिन की नौकरी हमारे यहाँ रात की नौकरी बन जाती है। इस प्रचलन ने युवाओं की सम्पूर्ण जीवन शैली को अस्त व्यस्त कर दिया है। जिस रात्रि को शयन के लिए उपयुक्त माना जाता है, वह काम करने में बीत जाती है और दिन सोने में। इसे 'सोशल जेटलेग' कहते हैं।

  आजकल दिन की नौकरी करने वाले भी जेटलेग का शिकार हो रहे हैं। सोशल मीडिया के अधिक प्रयोग ने तो इस जेटलेग जैसी ज्वलंत समस्या में आग में घी का काम किया है। पहले के समय में सब सूरज की पहली किरण के साथ उठ जाया करते थे। पर अब तो अधिकतर लोग देर रात तक वाट्स ऐप पर बातें करते हैं, फेसबुक पर स्टेटस अपडेट करते रहते हैं, यू ट्यूब पर वीडियो देखते रहते हैं। इसलिए सुबह भी देर से उठते हैं।

   सोशल जेटलेग साधारण जेटलेग से अधिक घातक इसलिए है, क्योंकि एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने से जो जैविक घड़ी हिल जाती है, वो वापस लौटने पर कुछ दिनों में पुनः नियोजित हो जाती है। परंतु एक ही स्थान पर रहने से सोशल जेटलेग की समस्या स्थायी है।

  इसलिए प्राचीन आयुर्विज्ञान और भारतीय ऋषि मनीषियों ने आरंभ से ही ब्रह्ममुहूर्त में उठने और रात्रि में शयन करने का उपदेश दिया। सूर्य की रोशनी से ही शरीर की बायोलाॅजिकल क्लाॅक सक्रिय होती है। इसे बदलने की चेष्टा में हम मात्र अपनी प्रकृति और संस्कृति के ही विरुद्ध नहीं जा रहे, अपितु अपनी सेहत के साथ भी बड़ा खिलवाड़ कर रहे हैं।

   प्रकृति ने एक घड़ी मानव शरीर में फिट की है। मानव शरीर की प्रत्येक कोशिका, एक एक अंग इस जैविक घड़ी के हिसाब से कार्य करता है। शरीर में यह घड़ी सूर्य के उदित और अस्त होने के मुताबिक कार्य करती है। सारांशत: सोने का उत्तम समय रात्रि का ही है। पौ फटते ही हमें उठ जाना चाहिए।

     शरीर के लिए भोजन जितना जरूरी है, उतना ही नींद लेना भी अनिवार्य है। अच्छी नींद शरीर को पर्याप्त ऊर्जा देती है और दिमाग को शांत रखने में मददगार होती है। हर वर्ग के लोगों के लिए कम से कम 7-8 घंटे सोना आवश्यक है।

(नोट- ध्यान साधना करने वाले साधकों पर नींद की अवधि लागू नहीं होती। योगनिद्रा द्वारा उनकी रात की नींद बहुत कम हो जाती है।)

**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**

"श्री रमेश जी"

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