सोचता हूं।

  

हम जो करते हैं, कहते हैं और देखते हैं,उसका तुरन्त असर/फल  हुआ/मिला तो  हुआ/मिला अन्यथा खत्म/नष्ट हो जाता है। यह काम सब लोग करते हैं और समाज में मान-सम्मान पाते हैं तो हमें भी

यह काम सही -गलत का विचार छोड़कर करना चाहिए, अन्यथा हम समाज में पिछड़ जायेंगे। लेकिन जब किए अच्छे-बुरे काम का परिणाम/फल  अच्छा/बुरा मिलता है तब अच्छे फल के लिए अपनी प्रशंसा और बुरे फल के लिए भगवान्/गैर व्यक्ति की निंदा करते हैं। हमें यह सुनिश्चित विश्वास नहीं रहता कि किए गए अच्छे-बुरे कामों/कर्मों का अच्छा -बुरा फल देर-सवेर

अवश्य ही भोगना पड़ता है।महर्षि पतंजलि ने अपने योगदर्शन में ठीक ही लिखा है --

तद्विपाके सति जात्यायुर्भोगा:। अर्थात्

कृत कर्म के तीन विपाक/परिणाम/फल

अवश्य हीहोते हैं --

१-जाति/जन्म।

२-आयु तथा

३-भोग।

                 प्रस्तुत कर्ता

 डॉ०हनुमान प्रसाद चौबे

                     गोरखपुर।

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