सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा वर्षा
हम सब अपने भीतर दो चेहरे लेकर चलते हैं। एक शांत, सकारात्मक उम्मीद से भरा! दूसरा बेचैन, भयभीत, क्रोध से भरा! कभी हालात अच्छे हो, तो हम शांत चेहरे वाले इंसान लगते हैं। सत्यता- दिव्यता की ओर बढ़ते दिखते हैं। वही परिस्थितियां दुष्कर होने पर हम बिल्कुल बदल जाते हैं। तमोगुण हमारे भीतर बढने लगता है। आसुरी प्रवृत्तियां दिखाई देने लगती है।
परंतु पाठकों! विचारणीय बात यह है कि हमारी ये दोनों अवस्थाएं परिस्थितियों पर नहीं, बल्कि हमारे चुनाव पर निर्भर करती है। किसी विचारक ने इसी बात को कुछ यूं कहा 'हर मनुष्य के भीतर दो भेड़िया रहते हैं-एक अच्छाई का और दूसरा बुराई का। इनमें से जो जीतता कौन है? जिसे हम अधिक भोजन देते हैं।'
आज की भागदौड़ भरी दुनिया में मानसिक कोलाहल के बीच हम अक्सर अपने भीतर छिपा वह शांत चेहरा भूल जाते हैं-जिसे बस थोड़ा- सा धैर्य, साहस और विश्वास चाहिए। जबकि दूसरा चेहरा डर, गुस्सा चिंता और असुरक्षा से शक्ति पता है। इसलिए जीवन का हर दिन हमसे यह प्रश्न पूछता है-
*आज किस भेड़िये को भोजन देना है*?
*आज खुद को किस रूप में गढना है*?
गोस्वामी तुलसीदास जी रामचरितमानस में लिखते हैं-
*"मन हीं मानी मन ही बंधन, मन ही साधन, मन ही ताप, मन ही रंजन"।*
इसका मतलब मन ही सब कुछ है यही बंधन देता है, यही मोक्ष का राह दिखाता है और यही खुशी और दुख भी देता है। तुलसीदास जी इस बात को बहुत गहराई से कहते हैं अगर मन की दिशा ठीक हो तो जीवन भी सही दिशा में बहता है। क्योंकि जैसा आपका मन होता है वैसा ही चेहरा दिखता है। हमारे वेदों में वर्णन आता है कि मन को सही दिशा ब्रह्मज्ञान के द्वारा प्राप्त होता है।
प्र ० ब्रह्म ज्ञान कहां मिलेगा?
उ० दिव्य ज्योति जागृती संस्थान में।
प्र० विश्व में शांति कैसे आएगी?
उ० ब्रह्मज्ञान से।
चयन आपके हाथ में है पाठकों! कौन सा रूप आपका वास्तविक परिचय बनेगा?
ॐ श्रीं आशुतोषाय नमः
श्री सियाबिहारी जी ✍️
