दु:ख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय। जोसुख में सुमिरन करे, दु:ख काहे को होय।।

 

                  दु:ख में सुमिरन सब करे,

                   सुख में करे न कोय।

                    जोसुख में सुमिरन करे,

                    दु:ख काहे को होय।।

अर्थात् दु:ख/आवश्यकता/आफत पड़ने पर सहायता/मदद के लिए सब लोग हर

व्यक्ति की सुमिरन/याद करतेहैं,परिचय 

बढ़ाते हैं ‌, मानवतावादी बन जाते हैं। परंतु सुख/कोई आवश्यकता न पडने पर

सभी लोग किसी की अपेक्षा/पहचान नहीं रखते, अपने को आत्मनिर्भर मानते हैं औरकिसी की आवश्यकता नहीं समझते। यदि व्यक्ति दु:ख के समान सुख में भी मानवतावादी हो,सबकी आवश्यकता समझे और सबके साथ यथायोग्य व्यवहार करे तो उस व्यक्ति को 

दु:ख में भी दु:ख का नहीं बल्कि उसे सुख का अनुभव होगा।


Post a Comment

Previous Post Next Post