**कर्म और ज्ञान, बिना योग के अधूरे हैं**

सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

भौतिक प्रकृति के पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश 5 स्थूल पदार्थ हैं। इन्ही के सूक्ष्म तत्व गन्ध, रस, रूप, स्पर्श, शब्द हैं, जो हमारे विषय-भोग कहलाते हैं। फिर भी इन विषय रूपी भोगों में रस/सुख अस्थायी है। दूसरी ओर भोगों को भोगने में हमारी सभी इंद्रियां उम्र बढ़ने के साथ-साथ कमजोर भी होती जाती हैं। ऐसा ज्ञान मन में स्थिर होने पर ही इन विषयों के प्रति अरुचि पैदा होती है और स्थायी सुख/आनंद की तलाश शुरू होती है, उससे पूर्व नहीं। 

    हम सभी मनुष्यों को अपना जीवन सदा ही धर्म संगत व नीति युक्त जीना चाहिए। अर्थात अपने जीवन निर्वाह व अन्य जीवों के परोपकार के लिए पुरुषार्थ करते रहना चाहिए। ऐसा करने से ही हमारे अंदर परमात्मा के गुण प्रविष्ट होने लगते हैं और हमारी आध्यात्मिक उन्नति होने लगती है। यही हमारे मनुष्य जीवन की सार्थकता है। 

    विना योग के कर्म और ज्ञान दोनों ही भौतिक है। केवल परमात्मा ही अभौतिक है और परमात्मा की भक्ति का होना या स्मृति बने रहना ही योग है। अर्थात कर्म और ज्ञान, बिना योग के अधूरे हैं। यानी योग होने से ही परमात्मा रूपी मंजिल को पाने के लिए आध्यात्मिक यात्रा आरंभ होती है, अन्यथा नहीं...।

**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**

"श्री रमेश जी"

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