सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
मनुष्य अपने वर्तमान जीवन में जो भी कर्म विकर्म करता है, भविष्य में उन्हीं का सुख दुख रूपी फल पाता है। अर्थात भविष्य का जन्म ही भूतकाल के गर्भ से होता है। दूसरी ओर हमारा वर्तमान ही भविष्य की नींव को रखता है। नींव जितनी अधिक मजबूत होगी, भविष्य रूपी इमारत उतनी ही ऊंची और सुंदर बन सकेगी। अर्थात हमें अपने जीवन में किसी ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरु से ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर ध्यान साधना व सत्संग करते हुए अपने भविष्य का निर्माण करना चाहिए। क्योंकि सत्संग के अभाव में हमारे कर्म दोषपूर्ण होने की संभावनाएँ बहुत अधिक रहती हैं।
भौतिक प्रकृति की 84 लाख योनियों मे केवल मनुष्य द्वारा किए गए पाप पुण्य कर्म ही लिखे जाते हैं। प्रकृति परमात्मा द्वारा बनाई गई एक अदालत है, जो सभी मनुष्यों द्वारा किए गए कर्मों विकर्मों का पूरा लेखा जोखा रखती है। और एक समय अंतराल के बाद दुख सुख रूपी फल प्रदान करती है। जबकि दूसरी ओर परमात्मा सदा मिले हुए दुखों को सहने की शक्ति और इन दुखों से बाहर निकलने का अवसर व स्वयं को जानने पाने का आध्यात्मिक ज्ञान भी देते हैं।
यह दुनिया एक मेला है। मेले की चकाचौंध में अक्सर बच्चे अपने माता पिता से बिछड़ जाते हैं, जबकि मेले की चकाचौंध सदा नहीं रहती। आज का मनुष्य भी माया नगरी में खो गया है। अर्थात आज का मनुष्य भी अपने माता पिता यानी परमात्मा से बिछुड़ गया है यानी परमात्मा को भूल गया है। अपने जीवन का लक्ष्य ही भूल गया है। इसलिए मनुष्य को अपने जीवन में किसी ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरु से ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर सदा ध्यान साधना व सत्संग करते रहना चाहिए...।
**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**
"श्री रमेश जी"
