*परमपद*

            सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा वर्षा

हम महापुरुषों द्वारा वर्णित परमपद की अवस्था पर दृष्टिपात  करते हैं। शास्त्र ग्रंथो के अनुसार परमपद वह अवस्था है, शून्यता की वह स्थित है, जब मन के विचार, मन की उतल-पुथल व हलचल पूर्णत: समाप्त हो जाती है। बिल्कुल विज्ञान की चरम शुन्य की स्थिति के समान। परंतु परमपद की अवस्था की प्राप्ति करना अति दुर्लभ है। जिस समय गरुड़ जी काकभुशुण्डि जी के समक्ष प्रश्न रखते हैं कि 'ज्ञान और भक्ति में क्या अंतर है'? तब उत्तर स्वरूप काकभुशुण्डि जी ज्ञान मार्ग का उल्लेख करते हुए कहते हैं-

*अति दुर्लभ केवल्य परम पद।*

*संत पुरान निगम आगम बद*।। (मानस उत्तरकाण्ड 118/2)

अर्थात हे पक्षीराज गरुड़! सुत, पुराण, वेद और शास्त्र कहते हैं कि कैव्लय रूप परमपद अत्यंत दुर्लभ है। कहने का भाव है कि भौतिकता के सीमित दायरे में जैसे चरम शुन्य (absolute zero) निरपेक्ष स्थिरता(absolute rest) की स्थिति को प्राप्त करना दुर्लभ है, वैसे ही अध्यात्म मार्ग में परमपद की अवस्था को प्राप्त करना भी कठिन है। 

परंतु तुलसीदास जी आगे वर्णन करते हैं-   *राम भजन सोई मुकुति गोसाई।*

*अनइच्ति आदि बरिआई।*

अर्थात श्रीराम को भजने से अत्यंत दुर्लभ मुक्ति परमपद की प्राप्ति संभव है। क्योंकि हमारे शास्त्रों में ब्रह्म को शून्य कहा गया है। जब मनुष्य ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर ध्यान- साधना द्वारा ब्रह्मस्थित  हो जाता है, तब परमपद व चरम शुन्य की दुर्लभ अवस्था भी उसे सरलता से प्राप्त हो जाती है अतः आध्यातम यहां भी विज्ञान से आगे है।

ॐ श्रीं आशुतोषाय नमः 

श्री सियाबिहारी जी ✍️

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