ईश्वरीय वस्तुओं का उपयोग/उपभोग भीउचित मूल्य/सही ढंग से करना चाहिए।

 

ईशावास्योपनिषद से ईशावास्यमिदंसर्वंयत्किंचजगत्यांजगत्‌। तेनत्यक्तेनभुंजीथा:मागृध:कस्यस्वि़द्धनम् ।।

 ईसा- भगवान् से 

वास्यम्- व्याप्त/आच्छादित/ निर्माण कृत/पूरित/भरा हुआ 

इदं सर्वं- यह सब

यत्किंच - जो कुछ 

जगत्यां- संसार में 

जगत्- चल-अचल चेतन-जड़ है।

तेन- उन सबका

त्यक्तेन -त्याग से/आसक्ति छोड़ कर/अपना न मान कर/दूसरे

(भगवान्)कासमझ कर/

होटल का मानकर/मूल्य चुका कर 

भुंजीथा:-भोग करें/लें/ग्रहण करें।

मा- मत/न/नहीं 

गृध:- लालच/ग्रहण/उपयोग/अधिकार करें 

कस्यस्वि़द्धनम् - किसी के भी/कोई भी धन/वस्तु का अनाधिकार/अनुचित/विना मूल्य चुकाए‌।

   —-ईशावास्योपनिषद,१

अर्थात् ईश्वर/भगवान् ने  ही यह सम्पूर्ण जड़ -चेतनमय संसार सभी जीवों/प्राणियों के समान और उचित उपयोग/उपभोग के लिए बनाया है न कि किसी अन्य ने मनमाने ढंग से अपने उपभोग/उपयोग के लिए बनाया है। इसलिए हर जीव/प्राणी को होटल/बाजार की वस्तुओं के समान प्राकृतिक/ईश्वरीय वस्तुओं का उपयोग/उपभोग भीउचित 

मूल्य/सही ढंग से करना चाहिए।

            प्रस्तुतकर्ता 

     डां०हनुमान प्रसाद चौबे 

             गोरखपुर।

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