सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा वर्षा
हमारी संपूर्ण सता का जो मूल है-वह प्राण- चेतना है। प्रत्येक अंग व इंद्रियों में प्राण -चेतना निहित है। इस प्राण- चेतना के व्यक्ति विशेष के अनुरूप अलग-अलग स्तर है। हमारे इंद्रियों की इस प्राण चेतना का जो भी स्तर अथवा आवृत्ति( frequency) होती है, उसी के समतुल्य आवृत्ति वाले दृश्य व ध्वनियां हम ब्रह्मांड से उठा पाते हैं और उन्हीं के अनुसार स्वप्न देखते हैं। ठीक जैसे की रेडियो स्टेशन लगातार वातावरण में अलग-अलग आवृत्तियों वाली तरंगें निसृत करता है। इधर हम रेडियो को जिस आवृत्ति पर सेट करते हैं, उसी आवृत्ति वाले रेडियो तरंगों को वातावरण से उठा पाते हैं। अर्थात उन्ही तरंगों से सामंजस्य बैठा कर ध्वनि व संदेश सुनते हैं। बिल्कुल यही विज्ञान हमारी चेतना का स्तर पर धटता है।
यही कारण है कि एक सामान्य व्यक्ति रोजमर्रा के सामान्य से ही 'भौतिक' कोटि का सपना देखता है। परंतु ब्रह्मज्ञानी साधक अथवा योगीजन, जिनकी प्राण- चेतना उच्च स्तरीय है,वे प्रेरक व दिव्य सपनों का आनंद लेते हैं। वैसे भी अपने अनुभव किया होगा, जब आपका आंतरिक सत्त्व 'तामसिक' होता है, उन दिनों आपको तामसिक कोटि के स्वप्न आते हैं। 'राजसिक'होता है, तो राजसिक कोटि के स्वप्न। परंतु जब आप दिन भर सात्विक आहार -आचार -व्यवहार- विचार रखते हैं, तो स्वप्न भी सात्विक कोटि के होते हैं। अर्थात सपनों की गुणवत्ता हमारे प्राण- चेतन की गुणवत्ता अथवा स्तर पर निर्भर करती है। इसलिए स्वामी विवेकानंद जी अपनी पुस्तक राजयोग में कहते हैं-यदि हम अपनी चेतना को उर्ध्वमुखी या उच्चस्तरीय बना ले, तो कुछ भी संभव नहीं रह जाता... तब सोते -जागते हम आगत -अनागत की महत्वपूर्ण सूचनाएं ब्रह्मांड से हस्तगत कर सकते हैं।
अंतिम प्रश्न उठता है, चेतना का विकास किस प्रकार संभव है? मात्र एक विद्या है!'हमारे ऋषियों और आध्यात्मिक वैज्ञानिकों द्वारा अविष्कृत-ब्रह्मज्ञान की ध्यान साधना! यह विद्या 'ब्रह्मज्ञान'जो पूर्ण गुरु द्वारा दीक्षा के समय दी जाती है।
ॐ श्रीं आशुतोषाय नमः
श्री सियाबिहारी जी ✍️
