*चयनात्मक श्रवण शक्ति (Selective Auditory Attention)*

           सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा वर्षा

हमारे स्थूल कानों में ऐसा कौन सा यंत्र फिट है, जो अपने आप ध्वनियों का अस्तर ऊंचा -नीचा कर लेता है?

वेदांतविद् ऋषियों ने इस विषय पर गहन शोध किया होगा। तभी तो उन्हें उत्तर स्वरूप केनोपनिषद मैं एक बड़ा मामर्मिक  मंत्र दर्ज किया -

*श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनों यद्वाचो ह वांच स उ प्राणस्य प्राण:।।२।।*

अर्थात वह जो आत्मा है, हमारे श्रावणों का श्रवण (कानों का कान), हमारे मन का मन, वाणी की वाणी और प्राणों का प्राण है। स्थूल कानों में इतना सामर्थ नहीं है कि वह कोलाहल भरे वातावरण के बीच अपनी वांछित ध्वनि का चयन कर सके। पर हमारे स्थूल कानों के पीछे एक ब्रह्म -शक्ति है, जो हमारे भीतर स्थित है। वही शक्ति अपनी परम चेतना द्वारा विभिन्न आवाजों में एक का चयन कर लेती है। उस पर केंद्रित होकर उसे अपने संज्ञान में ले लेती है। जो ऐन्द्रिक स्तर पर ही घटती है। मानसिक स्तर पर भी इसका असर देखा जा सकता है। सामान्य जीवन में कई बार ऐसी परिस्थितियों आती है, जिनसे हमारे मस्तिष्क  में तनाव, भय, अवसाद का कोलाहल गूंजने लगता है। 10 तरह के विचार मन में क्लेश मचाते हैं। समझ नहीं आता, कौन से विचार का चयन करें, जिससे मन शांत हो। 

ऐसे में, ब्रह्मज्ञान में दीक्षित एक साधक सद्गुरु द्वारा दिए गए (ब्रह्मज्ञान)आध्यात्मिक  विज्ञान का प्रयोग करता है। जब वह नियमित ध्यान- साधना करता है, तो अपनी परम चेतना को बेहतर रूप से सक्रिय कर लेता है। यही परम चेतना फिर उसके मन की मदद करती है। तरह-तरह के विचारों के शोर के बीच वह मन को आत्मा की आवाज पर केंद्रित कर देती है। ऐसे में साधक सटीक निर्णय ले पता है। आनंदित भी हो जाता है। 

मनोवैज्ञानिको की शैली में हम कह सकते हैं कि एक आत्मज्ञानी साधक 'चयनात्मक श्रवण शक्ति' से अपने जीवन को सुगम बना लेता है।

ॐ श्री आशुतोषाय नमः 

श्री सियाबिहारी जी ✍️

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