सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा वर्षा
इसमें परम सत्ता के लिए स्पष्टत: कहा गया है- *तुम हो एकागोचर सबके प्राण पति.... किस विधि मिलूं दयामय तुमको मैं कुमति।*
'अगोचर' का अर्थ है- 'अ+गो+चर'-जो इंद्रियों द्वारा प्राप्य नहीं। इंद्रियों को जहां तक पहुंच नहीं। किसी भी ज्ञानेंद्रिय द्वारा हम ईश्वर का ज्ञान नहीं पा सकते।
फल स्वरुप जन्म ले लेते हैं-नास्तिकवाद और अज्ञातवाद जैसे फलसफे! इसका निष्कर्ष है-ईश्वर नहीं है! ईश्वर अज्ञात है! पर हम भूल गए हैं कि जब प्राकृतिक ने हर वस्तु के ज्ञान- प्राप्ति के लिए विशेष इंद्रिय का चयन किया है, तो क्या सृष्टि के रचयिता के लिए कोई विशेष नियोजन नहीं होगा?
क्योंकि ईश्वर दिव्य है, इसलिए उसके ज्ञान हेतु यंत्र भी 'दिव्य' होना चाहिए। चुकि ईश्वरीय तत्व अलौकिक है, इसलिए उसके संज्ञान के लिए इंद्रिय भी अलोकी होनी चाहिए!
उस दिव्य यंत्र या अलौकिक इंद्रिय को हमारे शास्त्रों में 'तृतीय नेत्र'(Third eye) कहा, जो त्रिकुटी में स्थित है। इस दिव्य दृष्टि द्वारा अंतर्जगत व उसमें समये ऐश्वर्यरीय तत्व का प्रत्यक्ष दर्शन किया जाता है।
इस अलौकिक नेत्र को पूर्ण गुरु ही ब्रह्मज्ञान द्वारा जागृत करने का सामर्थ रखते हैं। इससे पूर्व हम आध्यात्मिक नेत्रहीनता के शिकार रहते हैं। ईश्वर को तरह-तरह के कर्मकांड द्वारा जानने की कोशिश करने पर भी नहीं जान पाते हैं।
इसलिए बंधुओ! अपने आध्यात्मिक नेत्रहीनता का उपचार कराएं! अपने अगोचर ईश्वर का अतींद्रिय 'दिव्य दृष्टि' द्वारा दर्शन करें।
ॐ श्रीं आशुतोषाय नमः
श्री सियाबिहारी जी ✍️
