सर्व श्री आशुतोष महाराजजी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
यह अटल नियम है कि जब भी मानव के भीतर प्रभु प्राप्ति की जिज्ञासा उत्पन्न हुई तो उसकी अभिलाषा सदगुरु की चरणों में जाकर ही शांत हुई। भगवान श्री कृष्ण गीता में समझाते हैं कि-
"तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्वदर्शिनः।।4-34
जिज्ञासु को श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ तत्ववेत्ता ज्ञानी सदगुरु की शरण में जाकर उन्हें दण्डवत प्रणाम करना चाहिए उनकी सेवा करनी चाहिए। उसके बाद उनसे ज्ञान के विषय मे प्रश्न करने पर वे उसे तत्वज्ञान का उपदेश देंगे।
हमारी संस्कृति का प्राचीन नियम रहा कि शिष्य पहले अपने भीतर पात्रता को विकसित करे, उसके बाद उसे ज्ञान की प्राप्ति होती थी।परंतु कलिकाल मे सदगुरुओं ने पहले ज्ञान दिया और फिर शिष्य को साधना-सेवा- सत्संग-गुरु दर्शन द्वारा पात्रता प्राप्त करने के निर्देश दिए। इसलिए आज सद्गुरु श्रीआशुतोष महाराज जी की असीम कृपा से हमें भी ब्रह्मज्ञान तो मिल गया है, परन्तु हमें अभी उसका अधिकारी बनना शेष है। हमें भी गुरु आज्ञाओं मे चलते हुए अपने मन को झुकाना है।
यह इतना आसान नहीं है। हम गृहस्थी शिष्यों पर घर परिवार की बहुत सी जिम्मेदारियां हैं। ऐसे में रोज आश्रम आना संभव नहीं हो सकता। इसलिए गुरु महाराज जी ने कभी अपने साधकों को ऐसे किसी नियम मे नहीं बांधा।
गुरु महाराज जी कहा करते हैं कि हर साधक के पास दो विकल्प हैं- पहला कि वह सुसंस्कारित व आध्यात्मिक वातावरण में जाकर साधना करे। दूसरा, वह अपने घर में ही ऐसा वातावरण निर्मित कर दे। श्री महाराज जी का हमेशा से यही लक्ष्य रहा है कि हर साधक दूसरे विकल्प को चुन उसे पूरा कर दिखाए।यानि हर घर ही तीर्थ बन जाए।
इसके लिए आवश्यकता है, हर घर के वातावरण को शुभ और संस्कारित करने की।नियमित रूप से साधना करना चाहिए तथा आध्यात्मिक विषयों पर चर्चा करना चाहिए। जब हर साधक अपने घर के वातावरण को यूं पवित्र कर लेगा, तभी सही मायनों में यह उक्ति अपना अर्थ रखेगी- "सबै धरती गोपाल की" अर्थात सारी भूमि ईश्वर की है। ऐसे में आप कहीं भी बैठकर साधना करेंगे तो आपका मन-चित प्रभु मे स्थित हो जाएगा।
**ओम् श्रीआशुतोषाय नमः**
"श्री रमेश जी"
