*आज्ञा-चक्र भी एक प्रकार का पोर्टल है जिसके द्वारा सूक्ष्म रूप से विभिन्न लोको में जाना संभव है*

       सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा वर्षा

जिस प्रकार से मिल्की -वे गैलेक्सी का केंद्र 'गैलेक्टिक केंद्र' है। ठीक उसी प्रकार से इस उज्जवल अंतर्जगत का केंद्र- बिंदु 'तृतीय नेत्र'(Third eye) है। हाड़ मांस का बना हमारा शरीर तो नाशवान है; परंतु यह जो ध्रुव केंद्र है, जिसे आज्ञा चक्र के नाम से जाना जाता है, वह अविनाशी है। श्री हरि शेष शैय्या पर गैलेक्टिक सेंटर के मध्य बैकुंठ धाम में विद्यमान है। अगर इसी समानता के यौगिक अर्थ पर हम विवेचन करें, तो कई रहस्य तथ्य उभर कर सामने आएंगे। 'शेष'अर्थात जो बचा रहता है, सब कुछ खत्म हो जाने पर भी जिसका अस्तित्व नहीं मिटता। शेषनाग की शय्या मानव देह में स्थित अविनाशी तत्व की ओर इशारा करती है। योग -निद्रा में स्थित श्री विष्णु परम चेतना को दर्शाते हैं। यानी हमारे तृतीय नेत्र के मध्य वह अविनाशी तत्व परम -चैतन्य श्रीहरि विद्यमान है।

  *गुरुदेव श्री आशुतोष  महाराज जी* आगे विस्तार पूर्वक समझते हुए बताते हैं कि जैसे 'गैलेक्टिक सेंटर 'पर खगोल विद 'कृष्ण -विवर की उपस्थिति को मानते हैं। साथ ही रिसर्च बतलाती है कि ब्लैक होल ऐसे द्वारा है, जिसके द्वारा दूसरे लोको में जाया जा सकता है। वैसे ही मानवीय गैलेक्टिक केंद्र 'आज्ञा चक्र'भी एक प्रकार का पोर्टल है, जिसके द्वारा सूक्ष्म रूप से विभिन्न लोको में जाना संभव है। भौतिक विज्ञान की उड़ान ब्लैक -होल पोर्टल के पार दूसरी दुनिया में कब जा पाएगी-यह तो आगे का समय बताएगा। लेकिन ब्रह्म ज्ञान के विज्ञान से तृतीय नेत्र के द्वारा अनंत अंतर्जगत में प्रवेश करना सुलभ है। 

जब पूर्ण गुरु शिष्य को ब्रह्म ज्ञान में दीक्षित करते हैं, तब सद्गुरु की शक्ति द्वारा शिष्य के भीतर की सोई चेतन जागती है और तृतीय नेत्र के कपाट खुलते हैं। यहां ध्यान - विधि द्वारा हम उस प्रकाशवान अविनाशी परम चेतना श्री हरि का दर्शन कर पाते हैं। 

ॐ श्री आशुतोषाय नमः 

श्री सियाबिहारी जी ✍️

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