श्रीमद्भगवत गीता में पांडव पुत्र अर्जुन भगवान् श्रीकृष्ण से कहते हैं कि हे माधव! इस कौरव-पांडव युद्ध में हम यह नहीं जानते कि हमारे लिए युद्ध करना और न करना –इंन दोनों में से कौन-सा अच्छा है, अथवा यह भी नहीं जानते कि हम जीतेंगे या नहीं।अतः आप से पूछता हूं कि जो साधन निश्चित रूप से हितकारी हो,वह मुझे बतायें, क्योंकि मैं आपका शिष्य हूं, आप के शरणागत हूं,इसलिए मुझे शिक्षा दें –
न चैतद्विद्म: कतरन्नो गरीयो
यद्वा जयेम यद्वा नो जयेयु:।
यानेव हत्वानजिजीविषाम:
तेs वस्धिता: प्रमुखे धार्तराष्ट्रा: ।।
कार्पण्यदोषोपहतस्वभाव:
पृच्छामि त्वां धर्मसमूढचेता:।
यच्छ्रेय: स्यान्निश्चितं ब्रूहितन्मे
शिष्यस्ते s हं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्।।-
अध्याय २,श्लोक ६-७
प्रस्तुतकर्ता
डाक्टर हनुमान प्रसाद चौबे
गोरखपुर।
