*ईश्वर तो घट-घट के वासी है, हमारे हृदय में ही निवास करता है*

        सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा वर्षा

गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं-  *ईश्वर: सर्वभूतनां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।*

अर्थात ईश्वर सभी भूत प्राणियों के हृदय में निवास करता है। परंतु इंसान उसे बाहर ढूंढता है क्योंकि भीतर अंधेरा है। आंखें मुंद कर देखो तो अंधेरे के सिवाय कुछ नहीं है। इसी बात को समझने के लिए एक बार संत रबिया ने एक लीला की। उन्होंने अपनी झोपड़ी के बाहर कुछ ढूंढना शुरू कर दिया। थोड़ी देर बाद वहां दो सज्जन गुजरे। वृद्ध रबिया को यो परेशान देख, वे उनके पास जाकर पूछते हैं कि, माता जी, आप क्या ढूंढ रही हो? रबिया जी ने कहा कि, 'मेरी सुई खो गई है। क्या तुम उसे तलाश करने में मदद करोगे?'वे दोनों सज्जन भी रबिया के साथ सुई ढूंढने लग गए। देखते- देखते वहां भीड़ लग गई, लेकिन कोई सफलता हाथ नहीं लगी। तब उसमें से एक समझदार व्यक्ति ने पूछा,' माता, सोचकर ठीक-ठाक बताओ की सुई गिरी कहां थी?' रबिया ने कहा,' बेटा, सुई तो झोपड़ी के अंदर गिरी थी।'यह बात सुनते हैं वह बड़े क्रोध में बोला, तो फिर सुई बाहर क्यों ढुढवा रही हो?'रबिया ने उत्तर देते हुए कहा कि, 'बेटा, अंदर तो अंधेरा है। इसलिए मैं बाहर ढूंढ रही हूं।' वह व्यक्ति थोड़ा शांत होते हुए बोला कि, 'अरे माई, सुई जहां गिरी है, वही तो मिलेगी। यदि अंधेरा था तो दीपक जलाकर प्रकाश कर लेना था।'माता रबिया ने तुरंत उत्तर देते हुए कहा, यही बात तो मैं तुम सबको समझना चाहती हूं कि आज तुम ईश्वर को बाहर खोज रहे हो,   जबकि वह हमारे सबसे निकट, हमारे अंदर में ही बिरज मान है। परंतु अंदर अंधेरा है, इसलिए किसी पूर्ण ब्रह्मनिष्ट गुरु के सानिध्य में जाकर भक्ति की शाश्वत विधि (ब्रह्मज्ञान) को प्राप्त करना चाहिए'। जब एक पूर्ण गुरु शिष्य के जीवन में आता है तो ब्रह्मज्ञान प्रदान कर शिष्य को उसके अंतर्घट में ही ईश्वर का दर्शन कर देता है। 

ॐ श्री आशुतोषाय नमः 

श्री सियाबिहारी जी ✍️

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