सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा वर्षा
वही मुसलमान खोजी उनके पास आते, तो पलटू साहब उन्हें यह कुंडली सुनाते -
तसबी एख रहै बेदाना, दिल अंदर में फिरो।
पाक मोहम्मद नजर परैगा, दिल गुंबज में हेरो।।
जाहिर चसम को दूरी करौ तुम, अंदर घिस के पैठो।
असमान के बीच रखना है इक, उस हुजरे में बैठो।।
किजै फहम फना लै के,नूर तजली अपना।
पलटू दास मका हूं हूं का,दीद दानिस्तन सुनना।।
अर्थात बाहरी मलाये फिरना बंद करो, दिल के अंदर तसबी फेरो, आदि नाम का सुमिरन करो, चमड़े की आंखों को मूंद लो और अंदरुनी दुनिया (अंतर्जगत) में प्रवेश करो। इस आंतरिक जहां में एक अनंत आसमान है, जिसमें एक गुंबद बनी है। गुंबद में पाक नूर का या खुदा का दीदार होता है। यही सच्चा मक्का है, जहां से इलाही हु- हु (अनहद नाद) की आवाज़ उठाती है। पलटू कहते हैं, इस इलाही नूर का दीदार करो और रूहानी संगीत को सुनो।
आशय यह है कि चाहे हिंदू आए या मुसलमान, संत श्री पलटू साहिब जी सभी को तत्वज्ञान का उपदेश देते हैं। पूर्ण सद्गुरु से ब्रह्मज्ञान की दीक्षा लेने के लिए प्रेरित करते हैं। संदेश देते हैं, बस भाषा का अंतर कर देते हैं। एक के लिए हिंदी दूसरे के लिए उर्दू -फारसी शब्दावली चुन लेते हैं। यही सभी पूर्ण -संतो सद्गुरुओं की शैली रही है।
ॐ श्री आशुतोषाय नमः
श्री सियाबिहारी जी ✍️
