सर्व श्री आशुतोष महाराजजी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
मुण्डकोपनिषद में कहा गया है कि प्रभु को न तो इन आँखों के द्वारा देखा जा सकता है न वाणी से वचनों को सुनने मात्र से और न ही इन्द्रियों के द्वारा प्रभु की प्राप्ति हो सकती है। तपस्या एवं कर्मों के द्वारा भी प्रभु की प्राप्ति नहीं हो सकती। जब ज्ञान की कृपा होती है, अन्तर्दृष्टि खुलती है, तभी मनुष्य अपने अन्तर में अन्य किसी प्रकार की चाह न रह जाने के बाद निष्कलं ब्रह्म का ध्यान करते हुए प्रभु का दर्शन करता है।
इसी प्रकार जब अर्जुन की अन्तर्दृष्टि खुली तो भगवान के अलौकिक दर्शन किए। तब भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं - हे अर्जुन, तुमने अभी जिस स्वरूप को देखा है उस रूप में मुझको न तो वेदों के अध्ययन के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है, न तपस्या के द्वारा, न दान यज्ञ इत्यादि के द्वारा ही मुझे इस रूप में देखा जा सकता है।
आश्चर्य है कि आज बड़े बड़े आचार्य, ग्रन्थी और पाठी इत्यादि ने मनुष्यों को उन्हीं कर्म-काण्डों में उलझाया हुआ है। धार्मिक ग्रंथों में प्रभु के अवतारों की वाणी रचित है कि जब जब भी परमात्मा का मानव रूप में अवतरण हुआ तो केवल इसलिए कि सभी शाश्वत कर्म से जुड़ सकें और जीवन का कल्याण करें।
अतः भौतिक जगत की नाशवान वस्तुओं से ध्यान को हटाकर हृदय में ही समाए सच्चिदानंद की प्राप्ति के लिए उस शाश्वत कर्म को जानें।
**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**
"श्री रमेश जी"

बहुत उत्तम विचार है।
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