सर्व श्री आशुतोष महाराजजी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
कबीर दास जी कहते हैं -
'तुम हो कौन कहाँ से आए कहाँ है निज घर तेरा।
केहि कारण तुम भरमत डोलो तन तज कहाँ बसेरा।।'
आध्यात्मिक जगत में प्रवेश पाने का पहला उपाय यही है कि हम स्वयं को जान लें कि हम कौन हैं? आत्म विद्या ही एक ऐसी विद्या है जिसको जान लेने के बाद कुछ भी जानना शेष नहीं रह जाता। आत्म विद्या को जाने बिना मनुष्य का जीवन एक साधारण व्यक्ति के जीवन के रूप में ही रहता है।
जिस प्रकार एक न्यायाधीश अपने बेटे-बेटियों के द्वारा की जाने वाली त्रुटियों को प्रेम भाव की नजर से देखता है। परंतु जब वह न्यायालय में पहुँचता है तो एक न्यायाधीश के व्यक्तित्व में सही और गलत, उचित-अनुचित का फैसला दृढ़ता पूर्वक करता है।
ठीक इसी प्रकार मनुष्य जिस समय अन्त:करण को जाग्रत करता है, तो विवेक के रूप में एक न्यायाधीश उसके अंत:करण में ही उत्पन्न हो जाता है जोकि उसको जीवन की सही दिशा की ओर अग्रसर करता है। परंतु उस न्यायाधीश रूपी विवेक को जाग्रत करने के लिए आवश्यकता है आध्यात्मिक जगत में प्रवेश कर आत्म विद्या को जानने की।
मुण्डकोपनिषद में कहा गया है कि दो प्रकार की विद्याएं होते हैं - एक अपरा विद्या और दूसरा परा विद्या। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, ज्योतिष इत्यादि अपरा विद्याएं हैं। तथा जिस विद्या के जान लेने से अक्षर ब्रह्म को जाना जाता है उसे परा विद्या कहते हैं।
छान्दोग्योपनिषद में बताया गया है - जब नारद मुनि संतकुमार के पास ज्ञान लेने पहुंचे तो संतकुमार ने पूछा कि तुम्हें कहाँ तक ज्ञान है। नारद ने कहा कि मैंने चारो वेद, इतिहास, नीतिशास्त्र, ज्योतिषशास्त्र इत्यादि अनेकों शास्त्रों को पढ़ा है परंतु मैं फिर भी शोकमग्न रहता हूं। तब ऋषि संतकुमार ने कहा कि तुमने जिस ज्ञान को जाना है वह ज्ञान तो शब्द मात्र है। इसे समझ लेने के बाद वाणी काम करने लग जाती है परंतु जरूरत है, आत्मज्ञान की। इसके बाद संतकुमार ने नारद के अंत:करण में उस सत्य को जाग्रत किया। उसके बाद नारद के चित्त का अंधकार दूर हुआ और नारद ने अपने हृदय में उस सत्य को जान लिया। जिस एक को जान लेने के बाद सब कुछ जाना हुआ हो जाता है।
अतः आत्मज्ञान को जानकर ही मनुष्य जीवन में सच्ची शांति को प्राप्त कर सकता है।
**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**
"श्री रमेश जी"
