सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा वर्षा
स्वास्तिक केवल मात्र एक चिन्ह या प्रतीक नहीं। यह तो हमारे लिए भारतीय संस्कृति की एक अनुपम आध्यात्मिक धरोहर है, जो अपने भीतर अनेक अमूल्य प्रेरणओ को संजोए हुए है। मनुष्य सांसारिक कार्यों को पूर्ण करता हुआ उनमें इतना उलझ जाता है कि अपने जीवन के इस सर्वेसर्वा केंद्र की ओर ध्यान नहीं दे पाता। वह ब्रह्म की ओर किस प्रकार केंद्रित हो सकता है? इस प्रश्न का समाधान भी हमें स्वास्तिक द्वारा प्राप्त होता है। स्वास्तिक चिन्ह की मुख्यतः चा र रेखाएं होती है। इन रेखाओं का प्रतीकात्मक अर्थ अत्यंत रहस्यमयी है। वास्तव में, अध्यात्म दर्शन में 'चार' का अंक अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। स्वास्तिक की चार रेखाएं चार वेदो(सामवेद, ऋग्वेद,यजुर्वेद, अथर्ववेद), विष्णु जी की चारभुजाओ और ब्रह्मा जी के चतुर्मुख रूप की ओर संकेत कर रही है। यह रेखाएं ब्रह्म ज्ञान द्वारा प्राप्त अंतर जगत की चार दिव्या अनुभूतियां की भी प्रतीक है। सद्गुरु की कृपा से ब्रह्म ज्ञान प्राप्त होते हैं इन चार पदार्थों -प्रकाश, अमृत, अनहद, नाम का हमारे अंतस् मैं स्वत: ही प्रस्फुटीकरण हो जाता है। अतः स्वास्तिक के चार रेखाएं दर्शा रही है कि अंतर्मुखी होने के लिए , ब्रह्म को जानने के लिए, हमें ब्रह्म ज्ञान प्राप्त कर इन चार दिव्य पदार्थो की अनुभूति प्राप्त करनी होगी।अंत में, मैं यही कहूंगा कि हमारे भारतीय संस्कृति का श्रेष्ठ चिन्ह- 'स्वास्तिक'अपनी बनावट व चित्रण द्वारा हमें आध्यात्मिक सर्वोत्तम सनातन विज्ञान ब्रह्मज्ञान की और प्रेरित करता है। यही स्वास्तिक का वास्तविक प्रेरणा है।
ॐ श्री आशुतोषाय नमः
श्री सियाबिहारी जी ✍️