करुण गोरखपुरी की रचना...

                              गीत

                           करुण गोरखपुरी

केवल समर्पण की तेरी रज़ामंदी है,मन रे सच कहने की तुझपे पाबंदी है।

स्वार्थ की प्रतिपूर्ति में नित नई कहानी,सब का है लक्ष्य एक नीति है पुरानी।

सुखी आंतड़ियाँ  है करें मनमानी,रोटियों के वास्ते है जूझती जवानी। 

उड़ते आकाश में जो कहती बड़ी मंदी है,मन रे सच कहने की तुझपे पाबंदी है।

जिंदगी है तार -तार कैसे हम उबारे,मुट्ठी भर दाने का कर्ज कब उतारें।

हठी नींद बर्फीली हवा को बिसारे ,वातायन रहित द्वार पर्द के सहारे।

महलों के मसीहा कहे आज बड़ी ठंडी है,मन रे सच कहने की तुझपे पाबंदी है।

नीति पर अनीत आज पड़ती है भारी,बेबस लाचारों में फैली महामारी, है 

महिमा मंडित होते आज दुराचारी,थक चुकीं है पाप धोते नदियां बेचारी

बुद्धिजीवी कहते "करुण" चुप अक्लमंदी है,मन रे सच कहने तुझपे पाबंदी है।

"करुण गोरखपुरी"




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