भगवान् श्रीकृष्ण पांडव पुत्र अर्जुन से कहते हैं कि हे कौंतेय!पांच ज्ञानेंद्रियां हैं–कान,आंख, रसना, नाक तथा त्वचा और इनके क्रमशः शब्द,रुप,रस,गंध तथा
स्पर्श पांच विषय हैं। ये दोनों पांच ज्ञानेंद्रियां और पांच विषय त्रिगुणी हैं और नश्वर, अनित्य तथा असत् हैं।इन दोनों यथा कान एवं शब्द के संयोग से उत्पन्न सर्दी -गर्मी और
सुख-दु:ख भी अनित्य तथा असत् हैं। अर्जुन! इनमें समभाव, अविचल रह , इन्हें सहन कर क्योंकि इन्हें सहन करने वाला मनुष्य मोक्ष अर्थात् सुख-दुख जैसे बंधन से मुक्त हो जाता है।अर्जुन! अनित्य और असत् वस्तुओंका भाव/अस्तित्व नहीं होता और न सत्य/नित्य वस्तुओं का अभाव ही होता है। यह अटल/सच है—
नासतो विद्यतेभाव: नाभावोविद्यतेसत:।
उभयोरपिदृष्टो न्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभि:।।-
अध्याय २, श्लोक १६
प्रस्तुतकर्ता
डाक्टर हनुमान प्रसाद चौबे
गोरखपुर।
