**जीवन की कहानी, आपके चिंतन की व्याख्या**

 सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन,अनमोल वचन प्रस्तुतीकरण श्री आर सी सिंग जी।


"संघर्ष ना हो, चोरी ना हो, तो पुलिस-न्याय क्या करेगा?"  

ये रामराज्य की कल्पना है। तुलसीदास लिख गए: _"दैहिक दैविक भौतिक तापा, राम राज नहिं काहुहि ब्यापा"। जहां सब अपने धर्म-कर्म में लगे हों, वहां डंडा लेकर खड़ा होने वाला चाहिए ही नहीं। पुलिस, कोर्ट, जेल – ये सब समाज की बीमारी की दवा हैं। बीमारी ही न हो तो दवा कौन खाए?  

पर व्यवहार की सच्चाई-- जब तक मन में लोभ-क्रोध-मोह है, तब तक 100 में 2-4 लोग गड़बड़ करेंगे। उनके लिए व्यवस्था चाहिए। नहीं तो 98 अच्छे लोग भी सुरक्षित नहीं रह पाएंगे।

"भगवान मानव को खोजने आते है"  ये उपनिषद का सार है। "अहम् ब्रह्मास्मि" – मैं ही ब्रह्म हूं। "तत् त्वम् असि" – वो तुम ही हो।  

कबीर कह गए: "मोको कहां ढूंढे रे बंदे, मैं तो तेरे पास में"। मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारा तो स्कूल हैं। असली भगवान तो भाव में बसता है। जब मन शांत, कर्म निष्काम, दिल में प्रेम – उसी पल भगवान मिला हुआ है। जो भाव-जगत में जीते हैं, उन्हें भगवान खोजना नहीं पड़ता।

"मानव स्वयं भगवान है, वो क्यों खोजेगा?"  

100% वेदांत है। गीता में कृष्ण ने कहा: "ममैवांशो जीवलोके" – सब जीव मेरे ही अंश हैं। हीरा कीचड़ में गिर जाए तो हीरा ही रहता है। बस कीचड़ धोना है। साधना, योग, प्रार्थना – ये कीचड़ धोने का साबुन है। जिस दिन मन का मैल धुल गया, उस दिन पता चलता है – मैं तो खुद ही वो था जिसे ढूंढ रहा था।

"दूसरे देश में अलग दुनिया है"  

भारत की मिट्टी में ये भाव हजारों साल से गूंथा है। यहां नदी को मां कहते हैं, पेड़ को देवता, अतिथि को नारायण। पश्चिम में भगवान को  "आकाश में बैठा जज" माना गया। इसलिए वहां चर्च जाना पड़ता है। *भारत में भगवान  "अंदर बैठा दोस्त" है। इसलिए मीरा ने नाचा, नानक ने गाया, बुद्ध चुप होकर बैठ गए – सबको मिल गया।

तो आप सही हैं या गलत? 

न आप पूरी तरह सही हैं, न गलत। आप एक ऊंची सीढ़ी की बात कर रहे हैं। जो अभी पहली सीढ़ी पर है – उसके लिए पुलिस चाहिए, मंदिर चाहिए। जो आपकी तरह सोचने लगा – वो छत पर पहुंच गया। अब उसे सीढ़ी की जरूरत नहीं।

भगवान को देखा किसने? जिसने खुद को देख लिया, उसने भगवान देख लिया। आईने में अपनी सूरत देखो – बस अहंकार का पर्दा हट जाए।

आपका भाव बिल्कुल सच्चा है। ये  "जरा सा"  नहीं,  "पूरा दर्शन"  है। बस इतना याद रखें – सबको एक साथ छत पर नहीं बुला सकते। किसी को सीढ़ी से चढ़ने देना होगा।

**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**

"श्री रमेश जी"

नोट:- लेख का उद्देश्य किसी को हानि अथवा ठेस पहुंचाना नहीं है।लेख, लेखक के अपने विचार है इसमें प्रकाशक की सहमति आवश्यक नहीं है।




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