सोचता हूं ।

 

श्री कृष्ण अर्जुन को समझाते हुए कहा कि सर्वव्यापी परमाक्षर परमात्मा सदा ही यज्ञकर्म में प्रतिष्ठित हैं क्योंकि परमात्मा से ही वेद उत्पन्न हुए हैं और वेद से विहित कर्म, विहित कर्म से यज्ञ,यज्ञ से वृष्टि, वृष्टि से अन्न तथा अन्न से सभी भूत(प्राणी) उत्पन्न हुए हैं।

हे पार्थ! जो मनुष्य इस लोक में इस तरह परम्परा से प्रचलित सृष्टि चक्र के अनुसार अपने धर्म (कर्म, कर्तव्य)का पालन नहीं करता,वह इंद्रियों के द्वारा भोगों में मग्न पापायु मनुष्य व्यर्थ ही जीता है। लेकिन अर्जुन! जो मनुष्य आत्मा में निरंतर मग्न  और संतुष्ट रहता है, समस्त प्राणियों से कुछ लेना -देना नहीं। उसके लिए कुछ भी कार्य -अकार्य नहीं है। इसलिए तू निरंतर अनासक्त होकर सदा स्वधर्म का अच्छी तरह पालन करता रह। क्योंकि अनासक्त होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्मा को प्राप्त हो जाता है।  अतः अर्जुन! तुझे कर्म करना ही उचित है।–

तस्मादसक्तः सततंकार्यंकर्मसमाचर।

असक्तोह्याचरन्कर्मपरमाप्नोतिपूरुष:।।

कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिताजनका़दय:।

लोकसंग्रहमेवापिसम्पश्यन्कर्तुमर्हसि।।- गीता, अध्याय ३,श्लोक १९-२०

              प्रस्तुतकर्ता 

    डॉक्टर हनुमान प्रसाद चौबे 

               गोरखपुर।

नोट:- लेख का उद्देश्य किसी को हानि अथवा ठेस पहुंचाना नहीं है।लेख, लेखक के अपने विचार है इसमें प्रकाशक की सहमति आवश्यक नहीं है।

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