सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा वर्षा
भगवान शिव का बहुत सुंदर अलबेला श्रृंगार -उनकी जटाओं से निरंतर बहती गंगा की धारा! क्योंकि भगवान शिव के जटाओं को वायुमंडल माना गया है, इसलिए उनमें समाई इस गंगा को विद्वानों ने ब्रह्मांड की चेतन -धारा कहा। चेतना की धारा अमृत धारा! ज्ञान बुद्धि की गंगा! ये धाराएं सारे वायुमंडल में सूक्ष्म रूप से समाई हुई है। पूर्ण गुरु से ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने के बाद एक साधक इन्हें अपने आकाश- तत्व या ब्रह्मरंध्र रूपी एंटीना द्वारा खींचकर भीतर समो लेता है।
यही नहीं, भगवान शिव भवतारिणी गंगा को नीचे उतार कर, पृथ्वी को सींचते रहते हैं। ठीक वैसे ही, सतगुरु सरकार और प्रगट गंगाधर है। वे ज्ञान- गंगा को शीश पर धारण करते हैं। फिर उसे उचित वेग से शिष्य के हृदय में उतारते हैं। सतगुरु द्वारा ज्ञान प्राप्ति के बाद ही शिष्य अपने अज्ञान, पाप- कर्मों और विकारों से मुक्त हो पता है। साथ ही, अपने इस ज्ञान का अमृत समाज में भी बाटता है। अज्ञानता से मृत हो चुके जनमानस में नए जीवन का संचार करता है। ठीक उसी प्रकार जैसे भागीरथ ने पृथ्वी पर गंगा उतारकर अपना और अपने पूर्वजों का कल्याण किया था।
ॐ श्री आशुतोषाय नमः
श्री सियाबिहारी जी ✍️
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