*"समाधि"*

           सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा वर्षा 

शास्त्रों में हमें भारतीय मनीषियों के समाधि विज्ञान की झलक भी देखने को मिलती है। शास्त्रों के अनुसार ध्यान का अंतिम स्तर 'समाधि' की स्थिति है। ऐसी अवस्था, जिसमें समाधिस्थ ऋषि- सत्ता की चेतना अपनी देह का अतिक्रमण कर बाहरी मंडलों में भ्रमण करती है। इस दौरान उनकी देह मृत्वत् भासित होती है। परंतु उनकी सूक्ष्म चैतन्य सत्ता साक्षी रूप में, सचेत रहकर, भूमंडल की सभी क्रियो का प्रत्यक्षदर्शी रहती है। फिर समाधि- काल पूर्ण होने पर यह चैतन्य सत्ता पुन: समाधि स्थ देह में प्रवेश कर जाती है। 

पर साधारण लोगों के मृत्योपरांत अनुभवो(Out of Buddy Experiences) और ऋषियों के देहातीत समाधि में बहुत अंतर है। वह  यह कि साधारण जनों की चेतना अक्सर दुर्घटना बस अन्यास ही देह से बाहर हो जाती है। यह प्राय: अनैच्छिक गमन ही होता है। इस गमन का कार्यकाल भी व्यक्ति के हाथ में नहीं होता।परंतु तत्वेता महापुरुषों की चैतन्य सत्ता अपनी देह का अतिक्रमण स्वेच्छा से करती है।  देह में पुनरागमन भी स्वेच्छा से करती है। इस अवधि का निर्णय भी पूर्णतः उनके अधिकार में होता है। 

    समाधि का यह देहातीत काल योगी की चेतना के लिए ब्रह्मांण्डीय आनंद का सुखद अंतराल होता है। वह अपनी इस अलौकिक स्थिति में अत्यंत श्रेष्ठ लक्ष्यो की पूर्ति करती है। दिव्य ब्राह्मण्डीय ऊर्जा का पुंज एकत्र करती है। 

ॐ श्री आशुतोषाय नमः 

श्री सियाबिहारी जी ✍️

नोट:- लेख का उद्देश्य किसी को हानि अथवा ठेस पहुंचाना नहीं है।लेख, लेखक के अपने विचार है इसमें प्रकाशक की सहमति आवश्यक नहीं है।






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