सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा वर्षा
बिना गुरु के सही दिशा में ज्ञान नहीं मिलता। गुरु हमें दिखाते हैं की भक्ति सिर्फ बाहरी रसम नहीं बल्कि आत्म परिवर्तन का साधन है। सच्ची भक्ति गुरु के बिना पूरी नहीं होती।
पर आज हम में से बहुत से शिव- भक्तों की यह मान्याता है कि भगवान शिव सब के गुरु हैं। उनके होते हुए अन्य किसी गुरु की कोई आवश्यकता नहीं है। लेकिन आप पढ़िए कि स्वयं हमारे प्रभु शिव ने गुरु गीता में मां उमा से क्या कहा-
*ब्रह्मानंद परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्ति द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्वमस्यादिलक्ष्यम्।*
*एकं नित्यं विमलमचलं सर्वाधीसाक्षिभूतम् भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरुं तो नमामि।।*
अर्थात 'हे उमा! जो ब्रह्मानंदस्वरूप, परम सुख देने वाले, केवल ज्ञानस्वरूप, द्वंदो से रहित है, आकाश के समान सूक्ष्म और सर्वव्यापक हैं, तत्वमसि आदि महाकाव्य का लक्ष्य को सिद्ध करने वाले हैं, सत्व, रज और तम तीनों गुणो से रहित है, ऐसे श्री सदगुरुदेव को मैं नमस्कार करता हूं।' ध्यान दें, यहां भगवान शिव जी ने स्वयं को सद्गुरु नहीं कहा। मानव जाति का आह्वान कर यह नहीं कहा कि तुम मुझे ही गुरु मानो, अन्य किसी गुरु की आवश्यकता नहीं है! अपितु उन्होंने तो स्वयं सद्गुरु के अलौकिक गुणो का वर्णन किया और अपना प्रणाम अर्पित किया। लेकिन आज हमारे शिव भक्त शिव को मानते हैं। लेकिन शिव ने क्या कहा, उनका नहीं मानते।
तभी तंत्रज्ञान में 'गुरु'शब्द के एक-एक वर्ण की व्याख्या इस प्रकार की गई है- 'गकर' माने ज्ञान, 'रेफ'माने तत्वज्ञान और 'उकार' माने शम्भू। अर्थात वह कल्याणकारी सत्ता जो ब्रह्मज्ञान देकर शिवतत्व को प्रकाशित करती है, वह गुरु है।
ॐ श्री आशुतोषाय नमः
श्री सियाबिहारी जी ✍️
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