**कृष्ण द्वारा आत्मज्ञान की दीक्षा मिलने के बाद अर्जुन का मोह भंग हुआ और अपनी प्रकाश स्वरूप आत्मा का साक्षात्कार किया।**

 सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन,अनमोल वचन प्रस्तुतीकरण श्री आर सी सिंग जी।


आत्मज्ञान या ब्रह्मज्ञान एक ऐसा आध्यात्मिक विज्ञान है, जिससे अपने अंदर सोई चेतना को जगाया जा सकता है। जब आंतरिक चेतना जागती है, तो मन की सोच अपने आप बदलती है। सोच बदलती है, तो व्यवहार और योग्यता भी तेजस्वी हो जाती है।

   इसकी एक व्यवहारिक (Practical) केस स्टडी हमें इतिहास में देखने को मिलती है। कुरुक्षेत्र में अर्जुन युद्ध (कर्म) क्षेत्र में खड़े होकर युद्ध न करने के तरह तरह के बहाने बना रहे हैं।

सीदन्ति मम् गात्राणि मुखं चपरिशुष्यति।

 ...भ्रमतीव च मे मनः।।(गीता 1-29)। 

अर्थात इस कर्म क्षेत्र में मेरे अंग काँप रहे हैं। मुख सूख रहा है और मेरा शरीर भी साथ नहीं दे रहा। गांडीव मेरे हाथ से छूट रहा है, मन भ्रमित हो रहा है।

   अर्जुन को प्रोत्साहन देने के लिए श्री कृष्ण ने अनेक प्रयोजन किए..

अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन" (गीता-2-2)। 

हे अर्जुन! अगर तू युद्ध (कर्म) नहीं करेगा तो स्वर्ग सुख भी खोएगा और मान सम्मान भी।

"हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्" (गीता 2-37)। 

   युद्ध में हार गया, तो स्वर्ग मिलेगा। जीत गया, तो समृद्ध राज्य भोगेगा।

परन्तु ये सभी प्रकार के प्रोत्साहन भी अर्जुन को कर्मठ नहीं बना पाए। तब श्री कृष्ण ने अर्जुन को आत्मज्ञान का उपदेश दिया--

अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शारीरिणः।

अनाशिनोप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत।।

(गीता 2-18)। 

अर्थात हे अर्जुन! यह शरीर और उससे जुड़े समस्त ऐश्वर्य एक दिन नष्ट होने हैं।इनके मोह को एक तरफ करके उस अविनाशी आत्मा से जुड़ जा और युद्ध कर।

उसके बाद श्री कृष्ण ने अर्जुन को आत्मज्ञान की दीक्षा दी जिसके द्वारा अर्जुन ने अपनी प्रकाश स्वरूप आत्मा का प्रत्यक्ष साक्षात्कार किया--

'दिवि सूर्यसहस्त्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता'

(गीता 11-12)। 

अर्थात मैं हजार सूर्यों का प्रकाश अपने घट के भीतर देख रहा हूँ।

इस प्रयोगात्मक आत्मज्ञान के बाद अर्जुन उद्घोष करते हैं- "नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा"-- मेरा मोह नष्ट हुआ और मैं सुमति के साथ युद्ध करने के लिए तैयार हूँ।

  इस तरह द्वापर का योद्घा कर्मवीर बन जाता है।

**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**

" श्री रमेश जी "

नोट:- लेख का उद्देश्य किसी को हानि अथवा ठेस पहुंचाना नहीं है।लेख, लेखक के अपने विचार है इसमें प्रकाशक की सहमति आवश्यक नहीं है।


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