**ब्रह्मज्ञानी साधक की साधना का लक्ष्य चेतना को सहस्रदल कमल तक पहुंचाकर अपने साध्य से एकाकार होना है।**

 सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन,अनमोल वचन प्रस्तुतीकरण श्री आर सी सिंग जी।

योगशास्त्र के अनुसार हमारे शरीर में आठ चक्र होते हैं- "अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पुरयोध्या"। मूलाधार से आरंभ होकर सहस्त्रार चक्र तक ये आठों चक्र अधिकांशतः सुप्तावस्था में ही रहते हैं। कुंडलिनी जागरण के अभिलाषी योगी इन चक्रों को क्रमवार ढंग से जागृत करने का अथक प्रयास करते हैं। लेकिन अधिकांश योगी निम्न चक्रों तक ही सीमित रह जाते हैं

     परन्तु वहीं दूसरी ओर जब एक साधक के जीवन में पूर्ण ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरु का आगमन होता है, वे उसे ब्रह्मज्ञान प्रदान करते हैं।अपनी आध्यात्मिक शक्ति का संबल देकर सहजता से ही सभी निचले चक्रों का भेदन कर देते हैं। भृकुटि के मध्य स्थित आज्ञा चक्र तक को जागृत कर देते हैं। संत कबीर जी कहते हैं-

"सद्गुरु ऐसा खेल दिखाया, मोहे देख अचम्भा आया।

नाभि कमल से पकड़ा हमको, दसवां द्वार लंघाया।।"

     अर्थात सद्गुरु सीधे ही दसवें द्वार माने आज्ञा चक्र को पार करा देते हैं। इस उच्च स्थल पर पहुंचते ही साधक ईश्वर के प्रकाश रूप का दर्शन करता है। इसके बाद निरंतर ध्यान साधना करते हुए ब्रह्मज्ञानी साधक को यात्रा करनी होती है।कहाँ से कहाँ तक? आज्ञा चक्र से सहस्त्रार चक्र तक की यात्रा।

    सहस्त्रार चक्र एक सहस्त्र पंखुरियों वाला कमल है।इसलिए इसे सहस्त्रदल कमल भी कहा जाता है।एक साधक जिस क्षण आज्ञा चक्र से आगे सहस्रदल कमल तक पहुंचता है, साधक और साध्य एक हो जाते हैं।चेतना ब्रह्मत्व को पा लेती है। क्योंकि सहस्रदल कमल ही वह सिंहासन है, जहां निराकार ब्रह्म विराजते हैं।महापुरुष कहते हैं-

"निरंजन घर का भेद सुनो सब संत।

काया नगरी बीच मनोहर त्रिकुटी महल सुहन्त।।

तिस के ऊपर बसे निरंजन जगमग जोत जगंत।।"

     अर्थात सुनो भई संतों, उस निराकार के घर का भेद सुनो !वह निरंजन ईश्वर त्रिकुटी से ऊपर सहस्रदल कमल में जगमग ज्योति बनकर जगमगा रहा है।

   ऋग्वेद के ऋषि कहते हैं-- "हे अग्नि (ब्रह्म), अथर्वा ऋषि  (विज्ञानवेत्ता ब्रह्मज्ञानी) ने आपको विश्व के महानतम आधार के रूप में कमल से मथकर निकाला।

    अर्थात वह अग्नि स्वरूप ब्रह्म सहस्रदल कमल में विराजित हैं। आज्ञा चक्र में उनके प्रकाश स्वरूप के दर्शन होते हैं। गुरुदेव श्री आशुतोष महाराज जी अक्सर कहते हैं- "ईश्वर को देख लेना उसे पा लेना नहीं है।"

   अतः ब्रह्मज्ञानी साधक की साधना का लक्ष्य चेतना को सहस्रदल कमल तक पहुंचाकर अपने साध्य से एकाकार होना है।

**ओम श्री आशुतोषाय नमः**

"श्री रमेश जी"

नोट:- लेख का उद्देश्य किसी को हानि अथवा ठेस पहुंचाना नहीं है।लेख, लेखक के अपने विचार है इसमें प्रकाशक की सहमति आवश्यक नहीं है।


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